मिलना जरूरी था (part 1)

मिलना जरूरी था

novel को डिवाइडेड part wise में रखा गया है।

Part 1 (मुलाकात)

1.1

दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते हुए न जाने कितने भौगोलिक दृश्य धीरे-धीरे बदल जाते हैं। कहीं नारियल के पेड़ों की कतारें पीछे छूट जाती हैं, तो कहीं खेतों का विस्तार आँखों के सामने फैलने लगता है। रेल अपनी सरसराहट के साथ आगे बढ़ रही थी और खिड़की के बाहर बदलते दृश्यों को आइमा अपनी आँखों में समेटती जा रही थी। सफर की लंबाई और बोरियत से बचने का इससे अच्छा उपाय उसे सूझा भी नहीं था। आइमा के पिता फिरोज के मन में अलग एक चिंता चल रही थी। उन्हें डर था कि बिहार में न जाने कैसे लोग मिलेंगे, कैसी जगह होगी और गाँव में रहना उनके लिए कितना कठिन होगा। तबादला रद्द तो हो नहीं सकता था, इसलिए नए कार्यालय में हाजिरी देना ही थी। सरकारी नौकरी में यही डर बनी रहती है—कब, कहाँ और किस जगह जाने का आदेश आ जाए, कोई नहीं जानता। इन्हीं विचारों में खोए फिरोज के कंधे को आइमा ने धीरे से हिलाया, “कहाँ खो गए, डैडी? टीटी सर आए हैं, टिकट तो दिखाइए।” फिरोज ने जैसे अचानक अपनी सोच से बाहर आकर टिकट निकाल लिया। टीटी ने टिकट देखा और मुस्कुराते हुए बोला, “आप लोग बिहार जा रहे हैं? हम भी बिहार से ही हैं। न जाने कब हम घर जाएँगे? कई साल हो गया हम इधर ही काम करते है, कभी चेन्नई से हैदराबाद, तो कभी हैदराबाद से चेन्नई।”

फिरोज ने उत्सुकता से पूछा, “आप अपने परिवार के साथ रहते हैं फिर घर की याद क्यों आती है?”

कौन बोला कि हम परिवार के साथ रहते हैं? हम तो अकेले रहते हैं।”

फिरोज उसकी बात समझ नहीं पाए। “हम... और अकेले?” आइमा चुपचाप उनकी बातचीत सुन रही थी। उसके चेहरे पर एक दुबकी मुस्कान तैर रही थी। टीटी ने टिकट वापस करते हुए कहा, “चलिए, फिर कभी मिलेंगे। दुआ में याद रखिएगा। आपका सफर मंगलमय हो।” वह आगे बढ़ गया। फिरोज ने आइमा की ओर देखा, “तुम इतना क्यों मुस्कुरा रही हो? एक तो पहले से ही टेंशन में हूँ और ऊपर से ये आदमी मुझे और उलझाकर चला गया।” आइमा हँसी रोकते हुए बोली, “टीटी सर अपने बारे में ही बात कर रहे थे। बिहार में ‘मैं’ की जगह ‘हम’ बोलते हैं।”

लेकिन ऐसा क्यों? और तुम्हें कैसे पता?”

मैं रील्स में देखी थी।”

फिरोज ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा! अब से ‘मैं रील्स में देखी थी’ नहीं, ‘हम रील्स में देखे थे’ बोलना हैं।” दोनों एक साथ खिलखिलाकर हँस पड़े।

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सफर लंबा था। उनके सामने वाली सीट पर बैठे यात्री कई बार बदल चुके थे। कुछ देर बाद एक नवविवाहित जोड़ा अपनी छोटी-सी गृहस्थी के साथ वहाँ आकर बैठ गया। उनके साथ एक छोटा बच्चा भी था, जो कुछ ही देर में आइमा से घुल-मिल गया और उसे बार-बार “दीदी... दीदी...” कहकर पुकारने लगा। फिरोज ने बेटी को बच्चे के साथ हँसते-खेलते देखा तो उन्हें लगा कि चलो, अब उसका मन कुछ बहलेगा। शाम धीरे-धीरे उतरने लगी थी। ट्रेन में खाने-पीने वाले भी इधर-उधर घूम रहे थे। कोई “पानी... ठंडा पानी...” की आवाज लगा रहा था। फिरोज ने एक विक्रेता को आवाज दी, “अरे भाई, कुछ खाने के लिए भी लाओ। भूख लगी है। एक ठंडा पानी भी दे देना। कितने हुए?”

आइमा तुरंत बोली, “हर जगह बीस रुपये के होते हैं, डैडी।”

सामने बैठे युवक ने हँसते हुए कहा, “नहीं-नहीं, रेलवे का पानी पंद्रह रुपये का आता है।” फिर उसने अपने बैग से चावल और गेहूं के भूंजे हुए दाने, चूड़ा, नमकीन, कटे हुए प्याज और कुछ मसाले निकाले। सबको एक साथ मिलाकर उसने फिरोज की ओर बढ़ा दिया। फिरोज झिझक गए, “अरे नहीं-नहीं, रहने दीजिए। रेलवे वाले खाना लेकर आएँगे।” युवक हँस पड़ा, “अरे खाइए कुटुम! वो कब आएगा, आएगा भी कि नहीं, कौन जानता है। ई देसी खाना है। पेट भरे न भरे, मन जरूर भर जाएगा।” फिरोज ने संकोच से पूछा, “यह क्या है?” “इसको हमलोग भूंजा बोलते हैं। जैसे शहर में लोग पास्ता, चाऊमीन वगैरह खाते हैं न, वैसे ही गाँव में शाम का नाश्ता समझ लीजिए। सभी अनाज के भूंजे दाने, चूड़ा, प्याज, नमकीन और मसाला... सब मिला दीजिए, स्वाद भी बढ़िया और पेट के लिए भी अच्छा। गाँव में तो हर कोई डॉक्टर होता है, किस चीज का क्या इलाज है, सबको मालूम रहता है—चाहे विज्ञान ने उसका इलाज खोजा हो या नहीं। आइमा, जो अब तक बच्चों के साथ खेल रही थी, उनकी बात सुनकर हँस पड़ी, “खा लो डैडी। अब हम भी तो बिहारी बनने वाले हैं।”

युवक ने उत्सुकता से पूछा, “बिहारी बनने वाले हैं, मतलब?”

मेरे पापा रेलवे विभाग में काम करते हैं। उनका बिहार में ट्रांसफर हुआ है। वैसे पापा, हम बिहार में किस जगह जा रहे हैं?”

गया जिले के भगवानपुर स्टेशन पर।” युवक ने तुरंत बीच में टोका, “अरे, आप अखबार नहीं पढ़ते हैं क्या? गया जी बोलिए। अब नाम बदल गया है।” युवक ने फिर कहा, “खाइए कुटुम, आप तो लगता है शरमा रहे हैं। बिहार में ना नहीं बोलते। वैसे कितने दिन के लिए आ रहे हैं?” फिरोज ने कंधे उचकाते हुए कहा, “पता नहीं भाई। जब सरकार का मन होगा, तब तक रहेंगे। दो महीने हो या दो साल।”

तब तो आप वापस नहीं लौट पाएँगे।” फिरोज थोड़ा घबरा गए, “क्यों? ऐसा क्यों?”

आप डरिए मत कुटुम। बात बस इतनी है कि जो आदमी एक महीना बिहार में रह लेता है न, बिहार उसे अपना बना लेता है... फिर धीरे-धीरे दिल में भी बसा लेता है।” फिरोज के चेहरे पर हल्की राहत आई। “डर तो नहीं लग रहा। बस यह चिंता है कि ट्रेन रात के दो बजे भगवानपुर पहुँचेगी। गाँव में आसपास सुविधाएँ होंगी भी या नहीं।” युवक ठहाका लगाकर हँस पड़ा। “इतनी चिंता काहे करते हैं! भारतीय रेल है। तीन-चार घंटा लेट चलती है, आपको तो पता ही होगा। आप आराम से सोइए। सुबह-सुबह सूरज बाबा की रोशनी के साथ उतरिएगा।”

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ट्रेन भगवानपुर स्टेशन पहुँची तो रात कब ढलकर सुबह में बदल गई, इसका पता ही नहीं चला। घड़ी चार बजा रही थी। स्टेशन पर कुछ कर्मचारी पहले से उनका इंतजार कर रहे थे। ट्रेन से उतरते ही एक व्यक्ति आगे बढ़ा। “आइए सर, आइए। कोई दिक्कत तो नहीं हुई ट्रेन में?” अजनबी जगह पर ऐसा आत्मीय स्वागत पाकर फिरोज का मन कुछ हल्का हुआ। सभी लोग उन्हें स्टेशन के क्वार्टर तक ले गए। “आप अभी आराम कीजिए सर। कोई जरूरत हो तो हमको बुला लीजिएगा। हमारा नाम सुधीर है।” फिरोज ने सिर हिलाकर धन्यवाद दिया। दोनों कुछ देर आराम करने के बाद उठे। नहा-धोकर कार्यालय जाने की तैयारी ही कर रहे थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई। खट-खट।

दरवाजा खोलते ही सामने सुधीर खड़े थे। “चलिए सर, सुबह-सुबह अपना आगमन कार्यालय में दर्ज करवा दीजिए। बाद में भीड़ हो जाएगी। और ये लीजिए... प्रसाद खाइए। आज ही गाँव में नए मंदिर का शिलान्यास हुआ है।” फिरोज प्रसाद लेने में थोड़े संकोच कर रहे थे। आइमा ने उनकी ओर देखा और आँखों ही आँखों में इशारा किया—ले लीजिए। फिरोज ने प्रसाद ले लिया। आइमा ने पूछा, “सुधीर अंकल, क्या मैं गाँव में अकेले घूम सकती हूँ?”

आप हमारे मेहमान हैं और अब यह गाँव आपका भी है। जाइए, गाँव की हवा और मिट्टी को महसूस कीजिए। बस गर्मी बहुत है, पानी की बोतल रख लीजिएगा।” फिर जैसे कुछ याद आया, बोले, “और हाँ, गाँव में पानी खरीदने की आदत मत रखिएगा। पानी खत्म हो जाए तो किसी भी घर से माँग लीजिएगा। कोई मना नहीं करेगा।” कुछ ही देर बाद फिरोज और सुधीर बस से जिला मुख्यालय की ओर निकल गए। और आइमा अकेली गाँव की ओर चल पड़ी।

सुबह का गाँव आइमा के लिए किसी किताब के खुले हुए नए पन्ने जैसा था। खेतों में हल चलाते किसान, कुएँ से पानी खींचती महिलाएँ, कंधों पर बस्ता लटकाए और किताबों को सीने से लगाए स्कूल जाते बच्चे—वह सब कुछ पहली बार देख रही थी। उसने अपना मोबाइल निकाला और एक-एक दृश्य को कैमरे में कैद करने लगी। शहर में उसने गाँव के बारे में बहुत कुछ सुना था, लेकिन गाँव को इस तरह अपनी आँखों के सामने जीवित देखकर उसे लग रहा था जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में आ गई हो। दोपहर होते-होते आइमा ने देखा कि गाँव के बगीचे में कुछ बच्चे इकट्ठा थे। आइमा ने उन्हें देखा तो हैरान होकर पूछ बैठी, “तुम लोग तो अभी स्कूल गए थे न?”

बच्चों ने भी उसे अचरज से देखा। “आप कौन?”

आइमा को शरारत सुझी, “मैं तुम्हारी नई स्कूल टीचर हूँ।” बस इतना सुनना था कि बच्चे वहाँ से भागने लगे। आइमा भी घबरा गई, “अरे भागो नहीं! मैं तो मजाक कर रही थी।” बच्चे कुछ दूर जाकर रुक गए। फिर धीरे-धीरे वापस लौटे।हमने खिचड़ी खा ली है, इसलिए स्कूल से वापस आ गए।”

तो यहाँ क्या कर रहे हो?”

बच्चों ने एक-दूसरे की ओर देखा। उनमें से एक ने धीरे से कहा, “अगर आप किसी को नहीं बताओगी, तभी बताएँगे।”

ठीक है, नहीं बताऊँगी।”

अभी हम कच्चे आम तोड़ेंगे। मसाला लगाकर खाएँगे। आप भी खाइएगा, बहुत अच्छा लगता है।” बच्चों ने पेड़ से कुछ कच्चे आम तोड़े। मसाला लगाया और आइमा को भी दिया। आइमा ने पहली बार वह स्वाद चखा। खट्टे आम में नमक-मिर्च की तीखापन मिली तो उसकी आँखें सिकुड़ गईं, मगर अगले ही पल चेहरे पर मुस्कान आ गई। “अच्छा है!” बस फिर क्या था। वह भी बच्चों की उस छोटी-सी शरारत का हिस्सा बन गई। बच्चों ने उसे पेड़ पर चढ़ना भी सिखाया। आइमा हँसते हुए किसी तरह डाल तक पहुँची और ऊपर से पूरे गाँव को देखने लगी। तभी उसकी नजर पास की एक छोटी-सी पहाड़ी पर पड़ी। वहाँ एक युवक अकेला बैठा था। आइमा ने बच्चों से पूछा, “वो कौन है?” एक बच्चे ने बिना किसी उत्सुकता के जवाब दिया, “वो आजाद भैया हैं।”

इतनी गर्मी में वो भी पहाड़ी पर अकेले बैठे हैं? पागल हैं क्या?”

बच्चे एक साथ हँस पड़े, “नहीं-नहीं। आजाद भैया तो हमारे गाँव के सबसे समझदार भैया हैं। हम सबको बहुत प्यार करते हैं।”

तो फिर वहाँ अकेले क्यों बैठे हैं?”

एक बच्चे ने कहा, “आज उनका जन्मदिन है न।”

उनके मम्मी-पापा नहीं हैं?”

हैं... मतलब...” बच्चा कुछ पल रुका, फिर बोला, “वो अपने जन्मदिन पर किसी से नहीं मिलना चाहते। इसलिए अकेले बैठे हैं।” बच्चों ने अपना सामान समेटना शुरू कर दिया। “अब हमारा घर जाने का समय हो गया। बाय दीदी... कल फिर मिलेंगे।बच्चे दौड़ते हुए गाँव की ओर चले गए।

आइमा कुछ देर वहीं खड़ी रही। उसकी नजर अब भी उसी पहाड़ी पर थी। एक अनजान आदमी, अपने जन्मदिन पर अकेला। न जाने क्यों, आजाद उसे दिलचस्प लगा। और शायद इसी जिज्ञासा ने उसके कदमों को उस छोटी-सी पहाड़ी की ओर मोड़ दिया। आइमा पहाड़ी पर चढ़ते-चढ़ते हाँफने लगी। ऊपर पहुँचते-पहुँचते उसकी साँस इस तरह फूल गई थी, जैसे पहाड़ी ने उससे अपनी पूरी कीमत वसूल ली हो। आज़ाद अब भी उसी तरह चुपचाप बैठा था। आइमा ने उसके पास पहुँचते ही झुँझलाकर कहा, “बड़े निहायत बेढंगे किस्म के इंसान हो तुम, आज़ाद। तुमसे मिलने के चक्कर में मेरी बोतल का पानी भी खत्म हो गया।” यह कहकर वह उसके बगल में बैठ गई। आज़ाद ने उसकी ओर देखा तक नहीं। अगले ही पल वह उठकर वहाँ से चला गया। आइमा ने उसे जाते हुए देखा और मन ही मन बुदबुदाई, कितना खड़ूस है! इसके लिए इतनी मेहनत करके पहाड़ी चढ़कर आई हूँ। कुछ ही देर बाद आज़ाद लौटा। उसने गिलास आइमा की ओर बढ़ाते हुए कहा, “ये ठंडा पानी पी लो, चुपचाप बैठो, साँस थम जाएगी, फिर अच्छा लगेगा।” आइमा ने बिना कुछ कहे पानी पी लिया। कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे। फिर आइमा ने चुप्पी तोड़ी, “अब तुम भी कुछ पूछोगे या सिर्फ मैं ही बोलती रहूँ?”

आज़ाद ने उसकी ओर देखा। “क्या नाम है तुम्हारा?”

आइमा।, “और पूछो... कहाँ से आई हूँ, कौन हूँ?

तुम्हें मेरा नाम कैसे पता चला?”

गाँव के एक बच्चे ने बताया था कि एक पागल आज़ाद नाम का आदमी इस पहाड़ी पर बैठा है। इसलिए मिलने चली आई।”

आज़ाद सुनकर हंसने लगा। आइमा ने पूछा, “वैसे... आज तुम्हारा जन्मदिन है?”

आजाद जवाब नहीं दिया। "अरे बोलो भी"

आज़ाद ने सिर हिलाकर हाँ जवाब दिया।

आइमा ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और फोन मिलाते हुए कहा, “डैडी, वापस आते समय एक केक लेते आना।” आज़ाद ने चौंककर उसकी ओर देखा, “तुम भी पागल हो क्या?” आइमा ने उसकी बात अनसुनी कर दी। सामने डूबते सूरज की ओर देखते हुए बोली, “सूर्यास्त हो रहा है। मेरी एक तस्वीर खींचोगे?” आज़ाद को हामी भरनी पड़ी। पहली तस्वीर के बाद आइमा ने मोबाइल देखा। “अच्छी नहीं आई।” दूसरी तस्वीर खिंची। “इसमें पूरी नहीं आई।” फिर तीसरी। “रुको... इस बार थोड़ी पीछे से।” धीरे-धीरे तस्वीरें कब चालीस तक पहुँच गईं, दोनों को पता ही नहीं चला। आइमा ने मोबाइल वापस लेते हुए पूछा, “तुम एंटी-सोशल किस्म के लड़के हो?”

आज़ाद ने उसकी ओर देखा, “तुम्हें मेरे लिए केक ऑर्डर नहीं करना चाहिए था।”

लेकिन क्यों?”

बताना जरूरी है?”

कोई बात नहीं। मुझे एक गिलास और पानी पीना है।” आज़ाद ने मटके की ओर देखा। “अब तो यह भी खत्म हो गया है। चलो, पास में ही मेरा घर है। वहाँ तुम्हारी बोतल भी भर जाएगी और पानी भी पी लेना।” आज़ाद का घर छोटा था। दरवाजे पर पहुँचते ही आइमा ने चारों ओर देखा, “यह तुम्हारा घर है? बहुत सुंदर है। लेकिन घर में कोई दिखाई क्यों नहीं दे रहा?” “माँ शायद बकरियाँ लाने गई होंगी।” आज़ाद इतना ही कह पाया था कि आइमा की नजर कमरे में रखी दवाइयों पर पड़ गई। “तुम्हारे पिताजी शायद दवाइयों से जुड़े किसी काम में होंगे... इतनी सारी दवाइयाँ!”

आज़ाद के चेहरे पर क्षणभर के लिए एक फीकी मुस्कान आई। “मेरे पिताजी बेंगलुरु में काम करते थे। बिहारी होने के कारण वहाँ कुछ लोगों ने उन्हें बेरहमी से पीटा। उनका हाथ तोड़ दिया... सिर पर भी गंभीर चोटें आईं।” आज़ाद की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि आइमा ने धीरे से कहा, “मैं भी बेंगलुरु की हूँ।” पानी भरते हुए आज़ाद के हाथ अचानक रुक गए। दोनों की आँखें मिलीं। एक क्षण के लिए जैसे कमरे की सारी आवाजें कहीं दूर चली गईं। न कोई प्रश्न था, न कोई उत्तर। केवल एक ऐसा मौन था, जिसमें दोनों पहली बार एक-दूसरे को थोड़ा और गहराई से देख रहे थे। तभी बाहर से बकरियों की घंटियों की आवाज सुनाई दी। आज़ाद की माँ लौट आई थीं। आइमा ने मुस्कुराकर उनका अभिवादन किया। कुछ ही देर में दोनों इस तरह बातें करने लगीं, जैसे उनकी पहचान आज की नहीं, बरसों पुरानी हो। आजाद उसे ताकता रहा। साँझ अब गाँव पर उतर चुकी थी। आज़ाद की माँ ने जाते-जाते कहा, “बेटा, आइमा को उसके स्टेशन वाले कमरे तक छोड़ आओ।” दोनों साथ चल पड़े। लगभग दस मिनट तक उनके बीच केवल कदमों की आवाज थी। रास्ता शांत था और उस शांति में दोनों का मौन भी साथ-साथ चल रहा था। आखिरकार आइमा ने ही चुप्पी तोड़ी, “मुझे लगता है, तुम कुछ कहना चाहते हो।”

“मुझे भी ऐसा ही लग रहा है कि तुम कुछ कहना चाहती हो। और अगर दोनों का जवाब ‘हाँ’ हो तो... लेडीज़ फर्स्ट।”

आइमा ने भौंहें उठाईं। “मैं फेमिनिस्ट हूँ। इसलिए पहले तुम बोलो।”

तुम्हें मुझसे जरा भी डर नहीं लगा?”

किस बात का?”

यह जानने के बाद भी कि तुम बेंगलुरु से हो... मैं तुम्हें चोट पहुँचा सकता था। आखिर मेरे पिता की यह हालत वहीं के कुछ लोगों के कारण हुई है।”

नहीं। तुम्हें देखकर नहीं लगता है कि तुम किसी को बिना वजह चोट पहुँचा सकते हो। तुम्हारे व्यक्तित्व में एक सहज शालीनता और धैर्य दिखाई देता है।”

फिर उसने पूछा, “और तुम क्या पूछना चाहती थीं?”

आइमा कुछ क्षण झिझकी। “मैंने सुना था कि बिहार में लगभग हर व्यक्ति के पास कट्टा या बंदूक होती है... और लोग अपमान या अन्याय का बदला लेना अपना धर्म-कर्म समझते हैं।”

आज़ाद हल्का-सा हँसा। “हूँ... योजना तो कुछ ऐसी ही थी।” आइमा ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। “उसी बीच खबर मिली कि तुम्हारे पिताजी का तबादला हमारे गाँव में हो गया है और वे बेंगलुरु से यहाँ आ रहे हैं। फिर गाँव की चौपाल में इस बात पर चर्चा हुई। आखिर में सबने मिलकर तय किया कि तुम्हारे परिवार का ऐसा स्वागत करेंगे, इतना अपनापन देंगे कि दोनों प्रदेशों के बीच खड़ी मनमुटाव शायद थोड़ी कमजोर हो जाए।”

वह कुछ क्षण रुका, “वैसे हमारी पीढ़ी में एक अच्छी बात तो आई है।”

क्या?”

हम Gen-z वाले धर्म, जाति, लिंग, वंश या क्षेत्र के नाम पर बैर करना जरूरी नहीं समझते।”

जब दोनों स्टेशन पहुँचे तो फिरोज और सुधीर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। फिरोज ने आइमा से तुरंत पूछा, “यह केक क्यों मंगवाया?” आइमा ने आज़ाद की ओर इशारा किया। “इनसे मिलिए। इनका नाम आज़ाद है... और आज इनका जन्मदिन है।” सुधीर ने तुरंत कहा, “लेकिन आज़ाद तो जन्मदिन नहीं मनाता!” आइमा मानो हक जताते हुए बोली, “नहीं मनाता होगा... लेकिन आज मनाएगा।” सुधीर ने आइमा को देखा, फिर आज़ाद को, फिर केक को। उसे यह सब कुछ बहुत विचित्र लगा। फिरोज गया जी से लौटते समय वहाँ की प्रसिद्ध मिठाई अनरसा भी लेकर आए थे। केक और अनरसे के बीच उस छोटे-से स्टेशन क्वार्टर में आज़ाद का जन्मदिन मनाया गया। फिरोज और सुधीर दिनभर की थकान के कारण सोने चले गए।

लेकिन आइमा के मन में अभी भी कई प्रश्न थे। वह आज़ाद से कुछ और बात करना चाहती थी। दोनों स्टेशन से बाहर निकलकर लोहे की एक बेंच पर बैठ गए। आसमान तारों से भरा था। आइमा कुछ कहने ही वाली थी कि आज़ाद ने धीरे से कहा, “क्या हम दस मिनट शांत बैठ सकते हैं?” आइमा चुप हो गई। आज़ाद आसमान में टिमटिमाते तारों को देख रहा था। और आइमा उन तारों का प्रतिबिंब उसकी आँखों में खोज रही थी। कुछ देर बाद उससे रहा नहीं गया, “क्या देख रहे हो?”

आज़ाद ने नजरें नहीं हटाईं, “आसमान को।”

तुम तो इसे रोज देखते होगे।” आज़ाद चुप रहा।

आइमा ने फिर पूछा, “तुम्हें तारे बहुत पसंद हैं?”

कुछ क्षण बाद आज़ाद के मुँह से जैसे अपने आप निकला, “मैं तारों के अंदर की दुनिया देख रहा हूँ।”

आइमा चुप हो गई। उसने पहली बार आसमान को वैसे देखने की कोशिश की, जैसे आज़ाद देख रहा था। शायद वह भी तारों के भीतर कोई दुनिया खोजने लगी थी। काफी देर बाद आज़ाद ने कहा, “अब मुझे घर के लिए निकलना चाहिए। जाने से पहले तुम से सॉरी कहना चाहता हूँ। न जाने कितनी बार बेरुखी से बात की।” आइमा अब भी चुप थी। “कुछ बोलो भी... कहाँ खो गई?” आज़ाद ने हल्के से उसके सिर पर टपली मारी। आइमा फिर भी चुप रही। शायद उसने ‘सॉरी’ सुना ही नहीं था। और आजाद फिर से बोलना चाहा पर बोला नहीं। वह बस इतना बोला, “मैं घर के लिए निकल रहा हूँ।” कुछ कदम चलने के बाद आइमा ने पीछे से आवाज दी, “सुनो!”। आज़ाद मुड़ा।

मैं इकॉनॉमिस्ट भी हूँ। मैंने तुम्हें पार्टी दी है, तो तुम्हें मुझे गिफ्ट भी देना चाहिए न।”

“मैडम, जिसका जन्मदिन होता है, उसे गिफ्ट मिलता है। और तुम तो सामने से माँग रही हो।”

हाँ। ये तो नॉर्मल लोगों के लिए नियम है। तुम जैसे फिलॉसफर्स के लिए उल्टा नियम चलता है।”

आज़ाद हँस पड़ा। “अच्छा, तो फरमाइए मैडम... इतनी रात गए आपको कैसा और क्या उपहार चाहिए?”

आइमा ने कुछ सोचकर कहा, “तुम मुझे कल कहीं घुमाने ले चलोगे?”

और मैडम को कहाँ घूमना है?”

गया और बोधगया तो बहुत अच्छी जगहें हैं। पर्यटक भी बहुत आते हैं। लेकिन तुम मुझे ऐसी जगह ले चलो जो थोड़ी अलग हो... और जहाँ बहुत कम भीड़ हो।”

“अच्छा... सोचता हूँ।”

“कल मैं यहीं तुम्हारा इंतजार करूँगी।” दोनों ने एक-दूसरे से शुभरात्रि कहा और अपने-अपने कमरों की ओर चल पड़े।




1.2

यहाँ एक बात पाठक के लिए जान लेना आवश्यक है कि आइमा आज़ाद से दो वर्ष बड़ी और बेंगलुरु में मनोविज्ञान की छात्रा थी। शायद यही कारण रहा होगा कि आज़ाद का अनोखा व्यक्तित्व उसे आकर्षित कर रहा था। या फिर गाँव की इस नई दुनिया में आज़ाद उसके लिए एक अनसुलझे प्रश्न की तरह था। सच क्या था, यह शायद आइमा खुद भी नहीं जानती थी।

अगली सुबह ठीक आठ बजे आज़ाद मोटरसाइकिल लेकर स्टेशन पहुँच गया। आइमा ने पिता से घूमने जाने की बात बताई। फिरोज को यह बात भीतर ही भीतर कुछ खटकी। बेटी किसी अनजान युवक के साथ इतनी निकटता से घूमे, यह विचार उन्हें सहज नहीं लग रहा था। उनके मन में धर्म, जाति, लिंग, वंश और क्षेत्र जैसे जाने-अनजाने कई प्रश्न अब भी कहीं दबे हुए थे। मगर वे यह भी जानते थे कि इन दीवारों को बनाए रखने से बेहतर है कि बेटी को मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने दिया जाए। आखिर इन सारे भेदभावों का सबसे स्वाभाविक उत्तर आपसी लगाव और प्रेम ही तो है।

आइमा बाइक पर पीछे बैठ गई। कुछ दूर निकलने के बाद उसने पूछा, “आज हम कहाँ जा रहे हैं?”

आज़ाद ने बिना पीछे देखे पूछा, “तुम्हें मुझ पर भरोसा है?”

आइमा सोचते हुए बोली, “शायद हाँ... और शायद नहीं भी।”

दोनों अभी इस जवाब पर मुस्कुराए ही थे कि अचानक सड़क के बीच एक बकरी आ गई। आज़ाद ने जोर से ब्रेक लगाया। झटके से आइमा का हाथ उसकी कमर को जोर से पकड़ ली। उसने हाथ हटाते हुए पूछा, “तुम्हारी कमर पर ये क्या है? कट्टा है क्या? तुम कट्टा लेकर क्यों घूम रहे हो?”

आज़ाद ने शरारत से कहा, “ज्यादा बोलीं तो इसी से ढेर कर दूँगा।” आइमा ने उसे घूरकर देखा। आज़ाद हँस पड़ा और बाइक आगे बढ़ा दी। कुछ दूर जाने के बाद उसने एक सुनसान-सी सड़क के किनारे बाइक रोक दी।आ गए। यही है आपकी घूमने की जगह।”

आइमा ने चारों ओर देखा। न कोई पर्यटक, न कोई दुकान, न कोई चहल-पहल। नजदीक एक पहाड़ी थी और उसके पास एक प्रतिमा, जिसे एक छोटे-से घरनुमा ढाँचे के भीतर रखा गया था। आइमा को काफी गुस्सा आ रहा था मन ही मन बोली इसे कितना लगाव है पहाड़ी से, कम से कम मुझे समझकर कुछ अच्छे जगह लेकर आता। आज़ाद ने उसके चेहरे की ओर देखा, “पहले अपने चेहरे से यह गुस्सा उतारो और ये गन्ने का रस पी लो। गला सूख गया होगा।” उसने अपने बैग से मिट्टी की दो बोतलें निकालीं, जिनमें गन्ने का रस भरा था। आइमा ने चुपचाप बोतल ले ली। रस पीते ही उसका चेहरा कुछ शांत हुआ।

कुछ बताने से पहले,” आज़ाद ने कहा, “इस पहाड़ी पर चलते हैं।” पहाड़ी पर पक्की सड़क बनी थी। दोनों कुछ देर वहाँ टहलते रहे। लौटकर उसी प्रतिमा के नीचे बैठ गए। अब आइमा से रहा नहीं गया। “आखिर इसमें मुझे क्या देखना था?”

यह प्रतिमा दशरथ माँझी की है। वह इसी गाँव के रहने वाले थे...” आज़ाद ने आइमा को उनकी पूरी कहानी सुनानी शुरू की। दशरथ माँझी की गर्भवती पत्नी एक दिन इसी पहाड़ी को पार करते समय गिर गई। अस्पताल पहाड़ी के उस पार थी। वहां पहुंचते-पहुंचते देर हो चुकी थी और उनकी मृत्यु हो गई। पत्नी को खोने के बाद दशरथ माँझी ने ठान लिया कि अब इस पहाड़ी की वजह से किसी और की जान नहीं जाएगी। उन्होंने अकेले छेनी और हथौड़ा उठाया और पहाड़ काटना शुरू कर दिया। लोग आते-जाते रहे, मौसम बदलते रहे, लेकिन वह अपने काम में लगे रहे। करीब बीस साल बाद उन्होंने पहाड़ के बीच से रास्ता बना दिया। सोचो आइमा... जिस हाथ को अपनी पत्नी का हाथ थामना था, वही हाथ बीस साल तक पत्थर तोड़ता रहा। जिस इंसान के साथ जिंदगी बितानी थी, वह साथ तो नहीं रही, लेकिन उसकी याद में उन्होंने पूरी पहाड़ी को ही बदल दिया। शायद एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को इससे बड़ा तोहफा दे भी नहीं सकता। अपनी पत्नी के जाने के बाद भी उन्होंने उसके लिए एक ऐसा रास्ता बना दिया, जिस पर चलकर न जाने कितने लोग अपने अपनों तक पहुँच सके।”

आइमा की आँखें भर आई। आज़ाद उसकी आँखों में ठहरे आँसुओं को देखता रहा। वह शायद उन्हें पोंछना चाहा, मगर तभी आइमा ने पलकें झपकाईं और आँसू गालों तक पहुँचने से पहले ही गर्मी की चिलचिलाती ऊष्मा से भाप बन गई। आज़ाद ने माहौल को हल्का करने के लिए कहा, “लगता है, आज कट्टे का इस्तेमाल नहीं हो पाएगा।” आइमा आँसू पोंछते हुए हँस पड़ी। आज़ाद मन ही मन मुस्कुरा दिया। वह अपने छोटे-से प्रयास में सफल हो चुका था। कुछ देर बाद आइमा ने पूछा, “वैसे... मुझे भी दिखाओ। कट्टा कैसा होता है?” आज़ाद हँस पड़ा, “तुम्हें सच में लगा था कि मैं कट्टा लेकर आया हूँ?”

हाँ।”

अरे, मैं मजाक कर रहा था।”

कुछ देर बाद आइमा ने पूछा, “तुम अपना जन्मदिन क्यों नहीं मनाते?”

आज़ाद ने सामने फैली पहाड़ियों की ओर देखते हुए कहा, “बचपन से मैं पूरी दुनिया घूमना चाहता था। लेकिन क्यों घूमना चाहता था, इसका जवाब मेरे पास नहीं था। लगा, शायद घूमना शुरू करूँगा तो खुद ही समझ में आ जाएगा। घूमते-घूमते बोधगया पहुँचा। वहाँ गौतम बुद्ध के बारे में जाना, उनके ज्ञान की यात्रा के बारे में पढ़ा। तभी समझ आया कि मैं सिर्फ पर्यटक बनकर घूमना नहीं चाहता। मैं एक यात्री की तरह घूमना चाहता हूँ—लोगों के बीच रहना, उनके समाज को समझना, उनकी छोटी-छोटी बातों को देखना और पढ़ना। लेकिन ऐसा करते हुए मुझे अपनी ही एक कमजोरी दिखाई दी—पूर्वाग्रह करना। हम चाहे जितना निष्पक्ष होने का दावा करें, हमारे भीतर पहले से बनी धारणाएँ कहीं न कहीं हमारे देखने के तरीके को प्रभावित करती हैं। इसका समाधान मुझे एक ही दिखाई दिया—पहले खुद को समझो। और खुद को समझने का सबसे कठिन तरीका है, अपने साथ समय बिताना। हर इंसान के लिए यह आसान नहीं होता। इसलिए अपने जन्मदिन पर मैं सिर्फ ‘मैं’ होता हूँ। वहाँ ‘हम’ नहीं होता—न कोई व्यक्ति, न कोई विचार। बस मैं... और मेरे साथ मेरा समय।”

 

आइमा उसे कुछ क्षण तक देखती रही। शायद वह पहली बार समझ रही थी कि पहाड़ी पर अकेला बैठा यह आदमी अकेला क्यों रहता है। आज़ाद ने पूछा, “वैसे तुम भी अपने बारे में कुछ बताओ।”

मैं साइकोलॉजी की स्टूडेंट हूँ... और संगीत की दुनिया में एक प्रसिद्ध गायिका बनना चाहती हूँ।” यह उत्तर उसने सोचकर नहीं दिया था। शब्द उसके भीतर से अपने आप निकल गए। आइमा की आँखें अब भी उसके चेहरे पर टिकी थीं। आज़ाद मुस्कुराया और धीमे स्वर में गुनगुनाया, “ऐसे मुझे न देखो... सीने से लगा लूँगा, और तुम्हें मुझसे मोहब्बत हो जाएगी।”

आइमा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “तो लगा लो गले।”

दोनों के चेहरे खिल उठे। जिस धरती पर कभी प्रेम के लिए एक पहाड़ काट दिया गया था, शायद उसी धरती पर आज दो लोगों ने अपने प्रेम का पहला बीज बो दिया था। उस दिन के बाद दोनों लगभग रोज मिलने लगे। कभी गाँव की पगडंडियों पर निकल जाते, कभी किसी पहाड़ी पर बैठते, कभी फल्गु नदी के किनारे देर तक बातें करते। वे एक-दूसरे के बारे में छोटी-छोटी बातें जानने लगे थे। कुछ बातें हँसी में निकल जातीं, कुछ सवालों में और कुछ केवल आँखों में ठहर जातीं। समय को भी उनकी निकटता से कोई शिकायत नहीं थी। देखते-देखते सत्रह दिन बीत गए। सत्रहवें दिन शाम को आइमा ने आज़ाद से कहा, “मैं कल बेंगलुरु जा रही हूँ।” आज़ाद ने कुछ नहीं कहा। वह जानता था, ये दिन एक न एक दिन आना ही था। आइमा ने रोज की तरह सहज स्वर में कहा, “कल सुबह स्टेशन आ जाना। आठ बजे। मेरी ट्रेन साढ़े आठ बजे है।”

 

आजाद जवाब नहीं दिया। वो शांत तो गया था। रात में घर की छत पर खटिया बिछाए सोने की कोशिश कर रहा था। पर नींद नहीं आ रही थी, बहुत बेचैनी हो रही थी। शायद आजाद नहीं चाह रहा था कि आइमा वापस जाए। उसने पूरी रात आसमान के सभी तारों से बात किया। कल सुबह 8 बजे आजाद स्टेशन पे आया। उसकी आंखे पूरी लाल थी। आंखे की पलकें बार बार आंख को चादर पहनने की कोशिश कर रही थी। दोनों मिले। बैग तैयार थे और ट्रेन भी आ चुकी थी। आजाद उसे पहली बार गले लगाना चाहता था पर उसे ये करना नागवार लगा। अभी तक आइमा को ऐसा कुछ महसूस नहीं हो रहा था। फिरोज, सुधीर और आजाद तीनों आइमा को ट्रेन में बैठाकर, खिड़कियों से बाय कर रहे थे। इतने में आइमा बाहर आकर आजाद को जोर से गले लगाकर बोली - थैंक्स आजाद, एक सुनहरा यादगार पल और एक अच्छा दोस्त बनने के लिए। आजाद पूरा स्थिर हो चुका था, वो चाहकर भी हिल नहीं पा रहा था। आइमा ट्रेन में वापस चढ़ गई। कुछ देर बाद ट्रेन चलना शुरू हुई और जैसे जैसे स्पीड बढ़ीं वैसे वैसे आजाद की धड़कन। कुछ देर में ट्रेन ओझल हो गई। आजाद वहीं खड़ा रह गया। स्टेशन पर एक चाय की दुकान के रेडियो पर गाना बज रहा था - एक अजनबी.. हसीना से.. यूँ मुलाक़ात हो गई.. "फिर क्या हुआ?".. ये ना पूछो,.. कुछ ऐसी बात हो गई !!

 

हर कहानी में किरदार को मजबूत दिखाया जाता है। खासकर पुरुष से तो समाज ने हमेशा यही उम्मीद की है कि वह हर परिस्थिति में मजबूत रहे, अपनी भावनाएँ छिपाए और आँसू को कमजोरी समझे। लेकिन शायद यह दौर बदल रहा है। Gen-z की दुनिया में पुरुष का भावुक होना, टूट जाना या किसी के लिए रो पड़ना कमजोरी नहीं, बल्कि इंसान होने की निशानी बनता जा रहा है। और शायद इसके लिए पुरुषों को इस पीढ़ी की स्त्रियों का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिन्होंने उन्हें हमेशा मजबूत दिखने की मजबूरी से थोड़ा मुक्त किया है।

 

खैर, कहानी की और बढ़ते हुए ये देखा गया कि आइमा के जाते ही आजाद बीमार पड़ जाता है। और उधर आइमा भी। जब प्रेम का दर्द मन से निकलकर शरीर तक पहुँच जाए, तो शायद समझ लेना चाहिए कि प्रेम अब सिर्फ एहसास नहीं रहा। अब आइमा को भी आजाद की आदत हो चुकी थी। हर दिन सुबह 8 बजे तैयार होती लेकिन उसे लेने के लिए कोई आजाद नहीं आता। इधर रोज आजाद 8 बजे स्टेशन तो आता है और उसी ट्रेन को जाते हुए देखता है। फिरोज को जब पता चला कि वहां आइमा की तबियत बिगड़ गई है और इधर आजाद का भी तो उसे अनुभव हो गया था कि शायद इस प्रेम के बीज को पानी की जरूरत है। ऐसा अनुभव फिरोज को इसलिए आया कि वो भी अपने यौवन में इस दर्द का भोगी था। फिरोज दोनों को सलाह देता कि फोन से एक दूसरे से बात करे। लेकिन न ही आजाद आइमा को फोन करता है और न ही आइमा आजाद को फोन करती है।


 






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