मिलना जरूरी था
मिलना जरूरी था
Part – 2 (संगीतमय साथ)
2.1
जनवरी की कड़कड़ाती दिल्ली की संध्या थी। आज़ाद राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर
खड़ा वैशाली लौटने वाली मेट्रो की प्रतीक्षा कर रहा था। दिल्ली आए उसे दो सप्ताह
बीत चुके थे, परंतु आज भी वह इस उलझन
में रहता कि कौन-सी मेट्रो वैशाली जाती है और कौन-सी नोएडा। उसने समीप खड़े एक सज्जन से पूछा, "भाई साहब, वैशाली जाने वाली मेट्रो यहीं आएगी?" सज्जन ने उसे ध्यान से देखा और
आश्चर्य से बोले, "अरे आज़ाद बेटा, तुम यहाँ?" आज़ाद
ने गौर से देखा। सामने फिरोज अंकल खड़े थे। वह झुककर उनके चरण स्पर्श कर बैठा। वैसे तो इस्लाम में पैर छूने का कोई मतलब नहीं
होता है लेकिन यह भारतीय संस्कृति है इसलिए आजाद से यह हो गया।
फिरोज संकोच भाव से बोले, "बेटा, यदि तुम्हें जल्दी न हो
तो कुछ देर बैठकर बातें करें?"
“जी अंकल जरूर।” दोनों स्टेशन के भीतर स्थित एक कैफ़े में जाकर बैठ
गए। फिरोज बोले, "मैं रेलवे की ओर से ट्रेनिंग के
लिए दिल्ली आया था। तुम मिले हो तो कुछ कहना था।
"जी अंकल, कहिए। मैं सुन रहा हूँ।"
उन्होंने गहरी साँस ली और बोले, “पिछले महीने आइमा की अम्मी का इंतकाल हो गया। अम्मी से उसका रिश्ता बहुत गहरा था। उसके जीवन में मित्रों
की कभी कमी नहीं रही, पर जब भी मेरी उसकी
अम्मी से बात होती, वे प्रायः तुम्हारा ही
ज़िक्र करती थीं। आइमा अपनी मित्रता के प्रत्येक छोटे-बड़े क्षण को अपनी अम्मी के
साथ साझा करती थी। अब माँ के चले जाने के बाद वह भीतर से बिल्कुल अकेली पड़ गई है।
मैंने जीवन भर उसे उसकी हर इच्छा पूरी कर देने का प्रयास किया, किंतु इस बात का मलाल
रह गया कि मैं अपनी बेटी का मित्र कभी न बन
सका।"
फिरोज की भर्राई हुई आवाज़ और आँखों में तैरते आँसू देखकर आज़ाद का हृदय भी
सिहर उठा। कुछ क्षण मौन रहकर
फिरोज बोले, “जब भगवानपुर में पहली
बार तुम्हें उसके साथ घूमते देखा था, तब अच्छा नहीं लगा था। मन में एक खटास जरूर आई थी, मुझे लगा था कि तुम दोनों के बीच एक सुंदर मित्रता
जन्म ले रही है। फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि तुम दोनों ने एक-दूसरे से बात करना ही
छोड़ दिया। खैर... मैं उसका कारण जानना भी नहीं चाहता। आज उसका जन्मदिन है, और मुझे भगवानपुर के लिए निकलना पड़ रहा है।"
आज़ाद ने धीरे से पूछा, "आइमा कहाँ है, अंकल?"
"कुछ दिनों बाद उसकी
इंटर्नशिप शुरू होने वाली थी, इसलिए वह भी दिल्ली आई है। किंतु फिलहाल इंटर्नशिप कुछ समय के लिए स्थगित हो
गई। मुझे नौकरी पर लौटना पड़ रहा है और वो यहाँ अकेली है। अपनी अम्मी के जाने के
दुःख से वह अब तक उबर नहीं पाई है।" यह कहते हुए फिरोज ने भावुक होकर अपना हाथ आज़ाद के हाथों पर रख दिया। "यदि समय मिले... तो उससे एक बार
मिल लेना।"
कभी-कभी मन की गाँठें शब्दों के सहारे खुल जाती हैं। लंबे अरसे से भीतर दबे
हुए भय, असमंजस, पश्चाताप और अपनी बेटी को खो देने की आशंका—फिरोज ने
सब कुछ आज़ाद के सामने रख दिया। सच ही तो है, अपने मन का बोझ बाँट देने से साहस कुछ और बढ़ जाता
है।
आज़ाद के पास कहने को कुछ भी नहीं था, होंठों से केवल इतना ही निकला— "ठीक है, अंकल।" कुछ देर बाद उसने कहा, "अंकल, आइमा को यहीं स्टेशन पर बुला लीजिए... लेकिन मेरे बारे में उसे कुछ नहीं बताइए।" फिरोज ने वैसा ही किया। कुछ ही देर में आइमा राजीव चौक स्टेशन पहुँची। स्टेशन
पर कदम रखते ही उसे एक जानी-पहचानी-सी सुगंध महसूस हुई। सुनने में थोड़ा फ़िल्मी
लगता है न? लेकिन ज़िंदगी में
कभी-कभी ऐसे चमत्कार भी होते हैं| उसे नहीं मालूम
था कि आजाद से मिलने आ रही है। जैसे ही आइमा ने अपने पिता के बगल में आजाद को देखी
वो दौड़ते हुए गले लगाना चाही, परन्तु कर न सकी। लेकिन आजाद की आंखों ने आइमा की आंखों से जोर से गले लगा
लिया। गले लगने से जो ऊष्मा पैदा हुई वो दिल्ली के कपकपाती ठंड को पानी पानी कर
दिया।
दोनों ने एक-दूसरे से पूछा -"कैसे हो?", "तुम कैसी हो?" कुछ ही शब्दों में न जाने कितने
अनकहे प्रश्न और उत्तर समा गए। इसी बीच फिरोज की ट्रेन का समय हो चुका था। वे विदा लेकर डिब्बे में जा बैठे।
आज़ाद और आइमा प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े खिड़की की ओर बाय करने लगे। धीरे-धीरे ट्रेन ने गति पकड़ी और कुछ ही क्षणों में
घने कोहरे में खो गई। आज़ाद ने शरारती
मुस्कान के साथ पूछा, "क्या मैं स्मार्ट लग
रहा हूँ?"
"मुझे तो ऐसा कुछ नहीं
लग रहा। क्यों पूछ रहे हो?"
आज़ाद ने दूर खड़ी तीन युवतियों की ओर संकेत करते हुए कहा, "वे दूर से मेरी तस्वीरें खींच रही
हैं।" आइमा मुस्कराई, "जब आप भारत सरकार के इतने बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर चुके हैं, तब तो फैन-फॉलोइंग तो होगी ही, लाइमलाइट में जो हैं।
"यह 'लाइमलाइट' क्या होती है?" आज़ाद ने आश्चर्य होकर पूछा। आइमा हँस पड़ी, "वाह, भारती जी! यदि तारीफ़ सुनने का इतना ही मन है, तो उन लड़कियों को यहीं बुला ले?”
"अरे नहीं... अभी तो
केवल तुम्हारे साथ रहना है, तुमसे बातें करनी हैं।" यह सुनते ही आइमा की आँखें नम हो उठीं। कुछ देर
बाद उसने बेबाक होकर पूछा, "क्या आज रात मैं तुम्हारे फ्लैट पर रुक सकती हूँ?" आज़ाद आंखे तिरछी करते हुए मुस्कुराकर बोला -
"देखो, मैं भी फेमिनिस्ट हूं
तो आई रिस्पेक्ट माई प्राइवेसी, तो तुम्हे मेरे फ्लैट के दूसरे रूम में सोना होगा। आइमा खिलखिलाकर हँस पड़ी।
आज़ाद ने पहली ही गेंद पर मानो छक्का जड़ दिया था। हँसते-हँसते उसकी आँखों में
आँसू छलक आए। आज़ाद मेट्रो से न जाकर उबर बुला लिया। गाड़ी में बैठते ही आइमा ने
अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया और बाँह पकड़कर सो गई। फ्लैट पहुँचते ही उसने
आज़ाद को कसकर आलिंगन में भर लिया। इस बार आज़ाद भी स्वयं को रोक न सका। सूर्यास्त
की आख़िरी किरणें जब तक धरती पर ठहरी रहीं, तब तक दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में खोए रहे। आइमा की
आँखों में आंसू थे। तभी फ्लैट की घंटी बजी। यदि वह घंटी न बजी होती, तो आलिंगन शायद कुछ और देर तक यूँ ही बना रहता।
आजाद पूछा, “तुम ठीक हो? दरवाजा खोलू?” आइमा सिर हिलाकर “हाँ” में जवाब दी।
"सर, आपका पार्सल।" दरवाज़ा बंद करते ही आइमा ने पूछा, "क्या मँगवाया है?" "केक" आजाद बताया।
साँझ ढल चुकी थी। दिल्ली में पक्षियों के नाम पर प्रायः केवल कबूतर ही दिखाई
देते थे और वे भी ठंड से बचने के लिए अपने-अपने फ्लैट में लौट चुके थे। आज़ाद ने
पूछा, "तुम्हारी इंटर्नशिप
कैसी चल रही है?" आइमा ने मुँह बनाते हुए
कहा, "इतने बोरिंग सवालों के
जवाब देने के लिए मैं यहाँ नहीं आई हूँ।"
"ठीक है," आज़ाद मुस्कराया, "आज केवल तुम बोलना, मैं सुनूँगा। लेकिन पहले केक काट लेते हैं।"
“एक बोतल शराब Blinkit कर दो।” आइमा बोली। आजाद ऑर्डर बुक करता है। आइमा ने जिज्ञासा भरे मन से पूछी, “तुम्हारी गर्लफ्रेंड साथ नहीं रहती?” आज़ाद हँस पड़ा, “गर्लफ्रेंड! मैं तो सीधा-सादा, अखंड अविवाहित पुरुष हूँ। अच्छा हुआ तुमने पूछ लिया।
मैं पिछले महीने पंजाब के कुछ शहरों में घूम रहा था। यार, आजकल शहर में तो बहुत तरह के रिश्ते पैदा हो गए है -
लिव इन रिलेशनशिप, फ्रेंड्स विथ बेनिफिट्स, ओपन रिलेशनशिप, लॉन्ग-डिस्टेंस डिजिटल रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप आदि आदि। मुझे ये सब समझने में बहुत
दिक्कत हो रही है।” आइमा को ये टॉपिक interesting लगा इसलिए उदाहरण के
साथ बताने लगी। आधे-एक घंटे में सारी बातें आसानी से आजाद को समझ आ गया। आजाद
थैंक्स बोलता है।
आइमा मुस्कुराते हुए बोली, “यदि सचमुच समझ गए हो, तो एक प्रश्न पूछूँ?”
“पूछो, अभी ताजा ताजा समझा हूँ, जवाब तो आसानी से दे ही दूँगा।”
“तो बताओ... हम दोनों के
रिलेशनशिप का क्या नाम दोगे?” अगर आजाद यहां जवाब दे पाता तो कहानी यही खत्म हो सकती थी, और इस सवाल पर पर्दा डालने के लिए Blinkit वाली दीदी ने बेल बजा
दिया।
“चलो, पहले केक काटते हैं।” आइमा ने केक काटा। दोनों ने
एक-दूसरे के गालों पर केक लगाया। तभी आज़ाद ने अपना एनालॉग कैमरा निकाला और आइमा
की दो तस्वीरें खींची। आइमा हँस पड़ी, "दुनिया मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी कर रही है और तुम अब भी इस पुराने कैमरे
से तस्वीरें खींच रहे हो!" आज़ाद आंखे तिरछी करते हुए मुस्कुराकर बोला, "हँस लो पहले, तुम्हारे मोबाइल में कितनी
तस्वीरें होंगी?"
"शायद पाँच-छह
हज़ार।"
"और उन्हें कितनी बार
देखती हो?"
"कभी-कभार।"
"यही तो अंतर है। मोबाइल
में तस्वीरें असीमित होती हैं, इसलिए उनका मूल्य भी कम हो जाता है। लेकिन इस कैमरे से ली गई हर तस्वीर सीमित
होगी। उसे देखने के लिए तुम्हें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। और जब वह तस्वीर तुम्हारे
हाथों में आएगी, तब जो आनंद मिलेगा, वह इन हज़ारों डिजिटल तस्वीरों से कभी नहीं मिल
सकता।"
आइमा को ये आइडिया अच्छा लगा लेकिन उसके हंसने पर आजाद बुरा महसूस कर रहा था।
"तो तुम्हे मॉडर्न चीजें
पसंद नहीं है?"
"हां, ऐसा बोला जा सकता है, आजाद ने जवाब दिया।"
"तो मैं भी मोर्डन लड़की
हूँ, तो तुम मुझसे भी नफरत
करते होगे?" यह सुनते ही आज़ाद बिना
कुछ कहे कैमरा टेबल पर रखकर, दूसरे कमरे में चला गया। आइमा को अपनी भूल का तुरंत
आभास हो गया। उसने पाँच मिनट प्रतीक्षा की, जब आज़ाद वापस नहीं आया तो वह स्वयं उसके कमरे में आ जाती है। उसे आते देख
आज़ाद सामने रखा अख़बार पढ़ने का नाटक करने लगा।
"आज़ाद... आई एम रियली
सॉरी।"
"कोई बात नहीं। टेबल पर डिनर
रखा है, तुम खा लो। मुझे भूख
नहीं है।"
"यार, मान भी जाओ...
" लेकिन आज़ाद मौन रहा। तब आइमा उसे मनाने के लिए धीमे स्वर में गुनगुनाने लगी—
"अच्छा जी मैं हारी,
चलो मान... जाओ... ना..."
प्रेम का वातावरण पुनः मधुर होने ही वाला था कि अचानक बिजली चली गई। आज़ाद
मोमबत्ती लेने उठा ही था कि उसका पैर एक तार में उलझ गया और वह गिर पड़ा। आइमा
घबराकर बोली, "चोट तो नहीं लगी? ... और जितना चाहे नाराज़ रहो, पहले बताओ मोमबत्ती कहाँ रखी है?"
आज़ाद ने धीमे स्वर में कहा, "बिस्तर के पास वाली टेबल पर होगी... वहीं माचिस भी रखी है।"
इस बार स्वर में अब पहले जैसी क्रोधाभास नहीं थी। आइमा ने माचिस जलाई ही थी कि
बिजली वापस आ गई। उसी समय उसकी नज़र तकिए के नीचे रखी कुछ तस्वीरों पर पड़ी। वे
तस्वीरें ऐसे ली गई थीं मानो किसी ने चोरी-छिपे कैमरे में कैद की हों। वे उसी दिन
की थीं, जब आइमा भगवानपुर से वापस
लौट रही थी। अब उसे विश्वास होने
लगा कि शायद आज़ाद भी उसे मन ही मन चाहता है। उसने कुछ पूछना चाहा, पर देखा कि आजाद की आँखें लाल हो चुकी थीं और वह
चुपके-चुपके आँसू पोंछ रहा था। आइमा उसके पास आकर ज़मीन पर बैठ गई, उसका हाथ अपने हाथों में लेकर बोली, "मुझे माफ़ कर दो। सच कहती हूँ, मुझे नहीं पता था कि मेरी बात तुम्हें इतनी बुरी लग जाएगी।" आइमा ने आजाद के आँसू पोंछे। आज़ाद धीमे स्वर में
बोला, "मैं कभी रोता नहीं...
लेकिन आज तुम्हारे उस एक शब्द ने मुझे रुला दिया—'नफ़रत'..."
कितनी विचित्र विडंबना थी! अब तक आइमा अकेलेपन की पीड़ा से जूझ रही थी और
सहारे की तलाश में थी, किंतु अब परिस्थितियाँ
पूरी तरह बदल चुकी थीं। वह अपने सारे दुःख भूल चुकी थी। इस समय उसका एकमात्र
उद्देश्य आज़ाद के मन को शांत करना था। कौन-सा प्रेमी अपने प्रिय को पीड़ा में देख सकता है? यदि उस क्षण कोई धुन वातावरण में गूँजती, तो शायद उसके बोल यही होते—
"ये आँखें देखकर हम सारी
दुनिया भूल जाते हैं,
इन्हें पाने की धुन में हर तमन्ना भूल जाते…. भूल जाते हैं।..."
कुछ देर बाद दोनों खाना खाने बैठे। आइमा ने धीरे से पूछा, "क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो?"
आज़ाद ने गुस्से में तंज कसते हुए कहा, "नहीं... मैं तो नफ़रत करता हूँ न?"
आइमा ने विषय बदलना ही उचित समझा। "बताओ, ये छह महीने कैसे बीते?"
आज़ाद ने गहरी साँस ली, "अभी उस बारे में बात करने का मन नहीं है। तुम अपने बारे में बताओ।"
"मैं भी अभी उस विषय पर
बात नहीं करना चाहती।"
"तो फिर वातावरण बदलते
हैं। कहीं घूमने चलते हैं। वैसे भी दिल्ली का प्रदूषण हमें बीमार कर देगा। तुम्हारी
इंटर्नशिप कब से शुरू हो रही है?"
"पच्चीस जनवरी से।"
"आज दस जनवरी है। यानी
हमारे पास बारह-तेरह दिन हैं। एक छोटी-सी यात्रा हो सकती है।"
"और तुम्हारा कोई
प्रोजेक्ट चल रहा होगा ना?"
"हाँ, थोड़ी बहुत है तो मै देख लूंगा।
"हम कहाँ जाएँगे?"
आज़ाद मुस्कराया, "क्या तुम्हें मुझ पर
भरोसा है?" आइमा ने उसकी आँखों में
देखते हुए कहा, "शायद हाँ और ....हां
ही।" उस एक शब्द ने दोनों की पुरानी स्मृतियाँ फिर से जीवित कर दीं। दोनों के
चेहरे खिल उठे। सच तो यह था कि आज़ाद के पास भी कोई निश्चित योजना नहीं थी। सफर का मज़ा तभी है जब कोई प्लान के अनुसार ना चले।
यूंही घूमते घूमते न जाने कहां किसी को अपना मंजिल मिल जाए। इसीलिए कभी भी आपको
बिना प्लान के लिए सफर जाने का मौका मिले, तो इस मौके को हाथ से न जाने दे। किताबें हमें ज्ञान
देती है और सफर एक अनुभव। और अगर ज्ञान और अनुभव को तराजू के पलड़े पर तौला जाए तो
बेशक अनुभव का भार ज्यादा होगा।
2.2
दिल्ली से किराये की गाड़ी लेकर दोनों अनजान राहों की ओर निकल पड़े। जैसे ही
यात्रा आरम्भ हुई, आइमा ने गाड़ी में गाने
लगाने लगी।
"आइमा, तुम्हारा तो शौक़ गायक बनने का है न? आज मेरे सामने भी कुछ सुनाओ।"
आइमा ने उत्साह से कहा, "क्यों न इस पूरी यात्रा में हम एक-दूसरे से केवल गानों के माध्यम से बात करें? इस सफ़र का नाम होगा— 'संगीतमय यात्रा'।" आज़ाद हँस पड़ा, "मैं और संगीत... दोनों
के बीच उतनी ही दूरी है, जितनी बिहार और बेंगलुरु के बीच।" आइमा ने चुटकी लेते हुए कहा, "सोच लिया जाए तो बेंगलुरु भी इतना दूर नहीं, भारती जी।"
"ठीक है, लेकिन मुझे तो केवल पुराने गाना ही आते हैं।"
"तो यह और भी अच्छी बात
है। मैं भी पुराने गानों की ही दीवानी हूँ। पहले मैं गाती हूँ। धीरे-धीरे उसकी मधुर आवाज़ गूँज उठी— "कौन दिशा में लेके चला रे बटुहिया..."
कुछ देर सोचने के बाद आज़ाद ने उत्तर में गुनगुनाया— "आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ, एक ऐसे गगन के तले, जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले..."
आइमा मुस्कराकर फिर गुनगुनाई— "हाल कैसा है जनाब का,
क्या ख़याल है आपका..." आजाद गुनगुनाया।
यात्रा में अब केवल सड़कें नहीं थीं, उसमें संगीत की सुगंध भी घुलने लगी थी। दिल्ली की सीमाएँ पीछे छूटते ही धुएँ और प्रदूषण का बोझ धीरे-धीरे हल्का होने
लगा। साँझ ढलते-ढलते वे भटिंडा के निकट एक छोटे से गाँव पहुँचे। वहीं आइमा ने एक एडवेंचर आइडिया सोची कि आज रात गाड़ी
में ही रुकेंगे। आज़ाद ने पहले तो मना किया, परन्तु आइमा की ज़िद…। रात के भोजन के लिए आइमा ने
ऑनलाइन पिज़्ज़ा मँगवा लिया। आज़ाद ने आश्चर्य से कहा, "यह क्यों? अब तो हम जहाँ जाएँगे, वहीं का स्थानीय भोजन करेंगे।" आइमा मुस्कराई, "ठीक है, आज आख़िरी बार। कल से केवल स्थानीय स्वाद।"
दोनों ने पिज़्ज़ा खाया और गाड़ी में ही रात बिताने की तैयारी कर ली। रात्रि में कोहरा घना होने लगा। शीतल हवाएँ बार-बार
गाड़ी से टकराती रहीं। बाहर का तापमान जितना गिरता जाता, भीतर दोनों के बीच की औपचारिक दूरियाँ भी उतनी ही
सिमटती जातीं। रातभर दोनों एक ही कंबल को लेकर टॉम एंड जेरी की तरह खींचातानी करते
रहे। प्रातःकाल जब सूर्य की पहली किरणें
धरती पर उतरीं, आइमा उठकर पास की नहर
पर हाथ-मुँह धोने चली गई। उसने लौटकर देखा कि आज़ाद अभी भी कंबल में दुबका हुआ था।
सोते-सोते उसका चश्मा भी आँखों पर ही टिका रह गया था। आइमा ने बड़ी सावधानी से
उसका चश्मा उतारा। सुनहरी धूप आज़ाद के चेहरे पर बिखर रही थी। उसने स्नेह से उसके
बिखरे बाल सँवारे और उसके ललाट पर एक kiss कर दी। "उठ भी जाओ।"
आज़ाद उनींदी आवाज़ में बोला, "बहुत ठंड लग रही है... लगता है मुझे सर्दी हो गई।"
आइमा हँस पड़ी, "मुझे भी।" पास के एक ढाबे पर पहुँचकर आज़ाद ने कहा, "पाजी, अगर गरमागरम नाश्ता तैयार हो तो दो प्लेट लगा
दीजिए।" आइमा ने तुरंत जोड़ा, "और दो गिलास गरम दूध भी।" आज़ाद ने मुँह बना लिया, "मुझे दूध बिल्कुल पसंद नहीं।"
"मैंने कह दिया है, तो पीना ही पड़ेगा। नहीं तो, आज रात भी गाड़ी में सोएंगे।"
आज़ाद अपनी नाक पोछते हुए बोला, "अगर आज भी गाड़ी में सोएंगे, तो कल दोनों अख़बार की सुर्खियाँ में उठेंगे।" नाश्ते के बाद आज़ाद ने गाड़ी की चाबी आइमा को थमा
दी। वह खुशी-खुशी चालक की सीट पर बैठ गई। शाम होते-होते वे जालंधर के समीप 'पिंड दा स्वाद' नामक एक ढाबे पर पहुँचे। उसके मालिक जसप्रीत सिंह और
उनकी पत्नी जसलीन कौर थे। दोनों आग ताप रहे थे। "पाजी, हम भी थोड़ी देर यहाँ
बैठ जाएँ?" "आओ पुत्तर, बैठो।" उन्होंने दोनों को देखा और मुस्कराकर बोले, "नाक तो तुम दोनों की बराबर बह रही है। अभी गरम दूध
लेकर आता हूँ।" यह सुनकर आइमा ने चुपके
से आज़ाद की ओर देखा और हँस दी। बातों-बातों में पता चला कि उनके बच्चे कनाडा में
बस चुके हैं और अब वे दोनों अकेले ही यह ढाबा संभालते हैं। जब आज़ाद ने आसपास किसी होटल का पता पूछा, तो जसलीन कौर स्नेह से बोलीं— "आओ पुत्तर, साडे घर ई ठहर जाओ। रात नूं सिकाई वी कर दवांगी, नहीं तां बीमार पड़ जाओगे। कल लोहड़ी वी साडे नाल मिल
के मना लेना।"
अनजान सफ़र में इससे सुंदर निमंत्रण और क्या हो सकता था? दोनों ने बिना किसी संकोच के उनका प्रस्ताव स्वीकार
कर लिया। रात्रि में जसलीन कौर ने सरसों के तेल और अजवाइन को आलाप की भाप से गरम करते हुए दोनों की सिकाई कर दिए। जीवन की
यात्राओं में जब कोई अपरिचित व्यक्ति इस प्रकार अपना बन जाता है, तब वह सफ़र यादगार के पन्नों पर सदा के लिए अंकित हो
जाता है।
कल सुबह दोनों उठकर तैयार होते है। गांव बहुत छोटा और शहर से दूर होने के कारण
आइमा और आजाद का आना पूरे गांव के लिए मेहमान का आना जैसा हुआ था। गांव के बच्चे, बुजुर्ग दोनों से मिलकर काफी खुश हुए। साथ में सभी
लोहड़ी के आग सजाएं, डोल गीत का व्यवस्था
सजी, अग्नि में रेवड़ी, मूंगफली, तिल, मक्के अर्पित किए।
लोकगीत में “सुंदर मुंदरिये हो” गाएं। रात्रि में सभी गांव मिलकर सामूहिक भोजन
किए।
“आगे
कहाँ जाओगे पुत्तर”, जसप्रीत अंकल पूछे?
“ऐसा
कोई प्लान नहीं है बस निकल पड़े है, प्यार और स्नेह जिधर घिंचेगी उधर हो लेंगे।“
“एक
जगह का नाम बताऊं जहां तुम दोनों को अलौकिक अनुभूति का दर्शन होगा।“
आइमा ने सिर हिलाते हुए बोली, “जी
बिल्कुल अंकल आप बताए,
हम ज़रूर जाएंगे।“
“हिमाचल
प्रदेश के कुल्लू जिले में मणिकरण गुरुद्वारा है। हम कई साल से जाने की सोच रहे है
लेकिन जा नहीं पाए।“
“तो
अंकलजी और आंटी जी आप चलिए न हमारे साथ”, आजाद ने तुरंत जाने के लिए पुछा।
“नहीं
पुत्तर, कुछ चीज़े रब तय करते
है। जब उन्हें बुलाना होगा हम खुद चले जाएंगे।“
रात में सभी खा पीकर सो जाते है। कल सुबह, आजाद और आइमा गांव से निकलने के लिए तैयार होते है तो
पूरा गांव उनसे फिर मिलने आता है। दोनों को एक एक जोड़ी पंजाबी पोशाक भेंट में
मिलती है। अंकल और आंटी जी आजाद को आशीर्वाद देते हुए बोलते है, "तुहाड़ी अर्धांगिनी दी मुस्कान
बहुत सोहणी है, रब करे तुहाड़ा रिश्ता
हमेशा यूँ ही महकता रहे।"
आज़ाद एक पल के लिए निःशब्द रह गया। उसने आइमा की ओर देखा। आइमा ने भी उसकी ओर
देखा। दोनों केवल मुस्करा दिए। वे चाहते तो बता सकते थे कि वे पति-पत्नी नहीं हैं, पर उस निष्कपट आशीर्वाद की पवित्रता को भंग करने का
साहस दोनों में से किसी ने नहीं किया। उन्होंने उस आशीर्वाद को मौन श्रद्धा के साथ
स्वीकार कर लिया। शाम ढलते-ढलते आज़ाद और आइमा मणिकरण पहुँच गए। पहाड़ों के बीच
बसा वह छोटा-सा तीर्थ अपने शांत वातावरण से ही मन को सुकून दे रहा था। दोनों ने
सबसे पहले गुरुद्वारे में माथा टेका, फिर लंगर किया। पूरे दिन की यात्रा ने उन्हें बुरी तरह थका दिया था।
गुरुद्वारे में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग कमरों में ठहरने की व्यवस्था
थी। दोनों अपने-अपने कमरे में जाकर गहरी नींद में सो गए।
अगली सुबह सूरज निकलने
से पहले ही गुरुद्वारे में हलचल शुरू हो चुकी थी। कहीं कीर्तन की मधुर आवाज़ गूँज
रही थी, तो कहीं लोग सेवा में
लगे हुए थे। मणिकर्ण का अदभुत ये बात भी है कि वहाँ पार्वती नदी के दोनों किनारों
पर अलग अलग लहरे बहती थी - एक तरफ इतना गरम की खाना उबल जाए तो दूसरी तरफ इतना ठंड
की चट्टानों एक दूसरे से सटकर बर्फ से जम जा रही थी। दोनों वहां प्रसिद्ध गर्म
जलकुंड में स्नान किया। फिर गुरुद्वारे के सेवाओं में लग गए। आजाद संगतकारों के
साथ चाय बनाने के लिए दूध लाने की सेवा में लग गया। उधर आइमा रसोईघर में बैठकर
सब्ज़ियाँ काटने लगी। दोबारा गुरुद्वारे में माथा टेकने के बाद दोनों ने आसपास की
पहाड़ियों की ओर निकलने का फैसला किया। ट्रैकिंग करते करते कब शाम की बेला चढ़ने
लगी, पता ही नहीं चला।
पहाड़ों पर सूर्य जल्दी डूब जाता है। थोड़ी देर की ट्रैकिंग के बाद वे एक ऊँची
चोटी पर जाकर बैठ गए। वहाँ से दिखने वाला
दृश्य किसी सपने से कम नहीं था। नीचे मणिकरण का छोटा-सा कस्बा, उसके बीच से बहती पार्वती नदी और उन पर बिखरी सुनहरी
धूप... ऐसा लग रहा था जैसे पूरी घाटी सोने की हल्की चादर ओढ़े मुस्कुरा रही हो।
कुछ देर तक दोनों बिना कुछ बोले उस दृश्य को बस देखते रहे।
खामोशी तोड़ते हुए आइमा बोली, "अगर डैडी आज यहाँ होते ना... बहुत खुश होते।"
"तो अभी वीडियो कॉल कर
के उन्हें भी यह नज़ारा दिखा दो।" आइमा ने तुरंत फिरोज़ को वीडियो कॉल लगाया। कभी वह कैमरा पहाड़ों की ओर घुमाती, कभी पार्वती नदी दिखाती और कभी गुरुद्वारे की ओर। उधर
फिरोज़ भी उस दृश्य को देखकर खुश हो उठे। कॉल खत्म होने के बाद आइमा मुस्कराते हुए बोली, "पता है, अभी पापा मुझे ही याद कर रहे थे।" आज़ाद ने धीरे से कहा, "ऐसा कई बार होता है, जब कोई रिश्ता सिर्फ़ नाम का नहीं, दिल का बन जाता है, तो एक की याद दूसरे तक बिना बताए पहुँच जाती
है।" आइमा कुछ पल चुप रही।
फिर बोली, "जानते हो... जब मैं
भगवानपुर से वापस बेंगलुरु गई थी, तब मुझे तुम रोज़ याद आते थे।" आज़ाद ने उसकी ओर देखा और बोला, "मुझे भी तुम्हारी याद आती
थी।"
"तो क्या हम भी ऐसे ही
किसी आत्मीय रिश्ते में बंध गए हैं?"
आज़ाद हल्का-सा मुस्कुराया, "शायद... हाँ। और शायद... नहीं भी।"
आइमा हँस पड़ी, "अरे! ये तो मेरा डायलॉग
है। कुछ नया बोलो।" आजाद ने सामने बहती नदी और उसके पीछे खड़े विशाल पर्वतों
की ओर इशारा किया और पूछा, "तुम बताओ... क्या पहाड़ और नदी आत्मीय रिश्ते में बंध सकते हैं?" आइमा तुरंत बोली, "नहीं, क्योंकि नदी तो बहते-बहते पहाड़
को पीछे छोड़ देती है। उसका रास्ता आगे होता है।" आजाद ने गहरी साँस ली, “बस, मैं भी यही कहना चाहता हूं कि मैं उस पहाड़ की
हूँ—रूखा, स्थिर और कुछ-कुछ
बेजान-सा... अपनी ही जगह ठहरा हुआ हूँ। और तुम... उस नदी की तरह हो—हँसमुख, चंचल, शरारती और हर पल जीवन से भरी हुई हो।"
आइमा ने भौंहें सिकोड़ते हुए उसकी ओर देखा। "कुछ समझ नहीं आया।" फिर वह स्वयं ही हँस पड़ी, "चलो, मैं कोशिश करती हूँ
समझाने की।" उसने नदी की दो धाराओं
की ओर इशारा किया। "देखो... हम दोनों इसी नदी की तरह हैं। मैं उस गर्म जलधारा
जैसी हूँ—उफनती हुई, शरारती, बहुत बोलने वाली। और तुम इस ठंडे पानी की तरह... शांत, स्थिर और अपने लक्ष्य की ओर बिना शोर किए बहते रहने
वाले।"
आजाद मुस्कुरा उठा। "वाह... मेरे साथ रहते-रहते काफी
कुछ सीख गई हो।"
आइमा ने मुस्कुराकर कहा, "तो फिर क्यों न मैं यह सीख और आगे बढ़ाऊँ?"
"….. और वो कैसे?" आजाद ने पूछा। आइमा की आवाज़ धीमी हो
गई। "क्यों न हम दोनों भी इस नदी की तरह
हो जाएँ? अलग-अलग धाराओं से चलकर
एक ही प्रवाह बन जाएँ। जैसे समय के साथ ये दोनों जलधाराएँ अपना भेद भूल जाती
हैं।" आजाद ने उसकी ओर देखा, फिर नज़रें फेर लीं। कुछ देर तक केवल नदी की उफनती आवाज सुनाई देता रहा। "अच्छी बातें कर लेती हो," उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा। "चलो... अब हमें लौटना चाहिए। शाम होने
वाली है। कल हिडिंबा मंदिर चलेंगे।"
आइमा ने उसके कदम रोकते हुए बोली "मैंने अभी तुमसे कुछ कही... उसका जवाब
तो दिया ही नहीं।" आजाद ने बात टालते हुए
कहा, "हो सकता है... अभी वापस
चलो। हमें अँधेरा होने से पहले वापस पहुँचना है।" अब दोनों साथ-साथ चल रहे थे, लेकिन उनके बीच एक अजीब-सी खामोशी उतर आई थी। यह वह खामोशी नहीं थी जो
अजनबियों के बीच होती है, बल्कि वह मौन था जिसमें भाव शब्दों से कहीं अधिक मुखर हो जाते हैं। आजाद
नज़रें चुराकर आगे बढ़ता रहा, जबकि आइमा उसकी हर चुप्पी के पीछे छिपे उत्तर समझने की कोशिश कर रही थी।
अगली सुबह दोनों हिडिंबा देवी मंदिर पहुँचे। मान्यता है कि हिडिंबा, राक्षस हिडिंब की बहन और पांडव पुत्र भीम की पत्नी
थीं। कठोर तपस्या के बाद उन्हें देवी का स्वरूप प्राप्त हुआ और उसी स्मृति में इस
मंदिर की स्थापना हुई थीं। मंदिर के दर्शन करने के बाद दोनों बाहर निकल आए। पास ही एक बुज़ुर्ग भुट्टे
भून रहा था। दोनों ने एक-एक भुट्टा लिया और देवदार के पेड़ों के बीच बैठ गए। सामने
व्यास नदी की घाटी दूर तक फैली हुई थी। ठंडी हवा के झोंके वातावरण को और भी शांत
बना रहा था। कुछ देर तक दोनों बिना
बोले उस दृश्य को निहारते रहे।
आजाद ने पूछा, "एक मानव और एक राक्षसी
का मिलन... तुम इसे किस रूप में देखती हो?"
आइमा ने भुट्टे का दाना तोड़ते हुए बोली, "मैं इसे केवल दो शरीरों का मिलन नहीं मानती। हर जीव
के भीतर एक ऊर्जा होती है। वही ऊर्जा अपने अनुरूप दूसरी ऊर्जा को आकर्षित करती है।
जब दो ऊर्जाएँ मिलती हैं, तब केवल एक संबंध नहीं बनता, बल्कि एक ऐसा योग बनता है जिसके पीछे ईश्वर का कोई उद्देश्य छिपा होता है।
"कैसे"?
आइमा बताई, “भीम और हिडिंबा का मिलन भी ऐसा ही था। उसी मिलन से घटोत्कच का जन्म हुआ। आगे
चलकर महाभारत में वही घटोत्कच वह कारण बना, जिसके कारण कर्ण को इंद्र से प्राप्त दिव्य शक्ति
अर्जुन के स्थान पर उसी पर प्रयोग करनी पड़ी। यदि ऐसा न होता, तो शायद धर्म की विजय का इतिहास कुछ और होता।" आजाद कुछ पल आइमा को देखकर बोला “वाह फिलोस्फर साहिबा, इतनी गहरी समझ।“
फिलोस्फर साहिबा और कुछ बोलना चाहती है -
"बोलिये"
आइमा आगे बोली, "मैं अपनी ज़िंदगी में न
जाने कितने लोगों से मिली हूँ। बहुत से दोस्त बने। लेकिन तुम्हारे साथ होने पर
हमेशा एक अलग-सी अनुभूति होती है। ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी ऊर्जा मुझे अपनी ओर
खींचती है।" शायद... हमारी ऊर्जा भी कुछ ऐसी है"। आज़ाद कुछ पल तक बस उसे देखता ही रह गया। जैसे उसकी
आँखों में छिपी कहानी पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। फिर अनायास ही उसके होंठों से
निकला, "और... अपने बारे में बताओ। आइमा कुछ देर तक
चुप रही। उसकी आँखें व्यास नदी की बहती धारा पर टिकी थीं, जैसे बीते छह महीनों की हर याद उसी पानी के साथ
बह रही हो। उसने गहरी साँस ली और बोली, “मेरे बेंगलुरु लौटने के बाद ज़िंदगी अचानक बदल
गई। पूरे छह महीने अस्पतालों और परेशानियों में ही बीत गए। पहले डेढ़ महीने तो मैं
खुद ही बीमार रही। शायद तुम्हारी और उन बीते दिनों की यादें ही मुझे भीतर से और
बीमार कर रही थीं। भगवानपुर की वो यादें, हमारा वो छोटा-सा सफर... और तुम—सब कुछ बार-बार
याद आता था। उसके बाद मुझे अपने डॉक्टर के साथ
मनोविज्ञान पर शोध करना था। उसी में समय निकल गया। लेकिन सबसे मुश्किल दौर आख़िरी
दो महीनों का था। मम्मी की तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई... और एक दिन उन्होंने
हमेशा के लिए मेरा साथ छोड़ दिया।"
आख़िरी शब्द उसके होंठों से निकलते-निकलते काँप गए। उसकी आँखों से आँसू बह
निकले। आजाद ने उसकी ओर देखा। उसका मन हुआ कि उसके आँसू पोंछ दे, उसे दिलासा दे, लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया। सिर्फ अपने हाथ से
आइमा के हाथ थाम लिया और अपने कंधे को आइमा के सिर को सहारा दिया। कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों या स्पर्श से
नहीं, बस सम्मान से स्वीकार
किया जाता है। इसलिए वह चुपचाप उसके साथ बैठा रहा। थोड़ी देर बाद आइमा ने स्वयं को संभाला और हल्की
मुस्कान लाने की कोशिश करते हुए बोली, "बहुत मेरी सुन ली... अब तुम बताओ। इन छह महीनों में तुम्हारी ज़िंदगी कैसी रही?"
आजाद ने दूर फैले पहाड़ों की ओर देखते हुए कहना शुरू किया, "हम करीब डेढ़ महीना भगवानपुर में
ही बिताए। उस दौरान मेरी बहन ने बताया कि मेरी हालत ठीक नहीं थी। पता नहीं क्यों
लेकिन मेरा मन प्रतिदिन भगवानपुर स्टेशन बुलाता। कुछ देर उसी ट्रेन को देखता, फिर चला जाता। गांव
वालो को भी मेरी चिंता होने लगी। सभी ने मुझे सलाह दिए कि मुझे अपने काम में लौट
जाना चाहिए। तभी भारत सरकार की ओर से एक और प्रोजेक्ट का प्रस्ताव मिला। मुझे
छत्तीसगढ़ जाकर वहाँ के नक्सल प्रभावित इलाकों, वहाँ के समाज और लोगों के जीवन को समझना था, ताकि उस पर एक detailed documentation तैयार किया जा सके। करीब
तीन महीने मैं वहीं रहा। लौटकर, मैंने उसी विषय पर एक किताब लिखी— 'परिचित का अपरिचित भारत'। किताब पूरी करने में लगभग एक
महीना लग गया।"
"उसके बाद कुछ समय पंजाब
में रहा। आज के बदलते रिश्तों और वहाँ के सामाजिक जीवन को समझने की कोशिश कर रहा
था। फिर कुछ दिनों से दिल्ली में था। जल्द ही एक नया प्रोजेक्ट मिलने वाला था, लेकिन.......बात काटते हुए बोला खैर, ये सब छोड़ो... आगे का क्या प्लान है?
आइमा बोली, "मुझे पता नहीं, मैं तो तुम्हारे भरोसे आई हूं।" आजाद बोला, "सबसे पहले ये गाड़ी कंपनी
में वापस कर देते हैं। अब आगे का सफर लोकल गाड़ियों से करेंगे। इससे जगहों को भी
करीब से देख पाएंगे और लोगों से बातें करने का मौका भी मिलेगा।" दोनों कुल्लू लौटे और किराए की गाड़ी कंपनी को वापस
कर दी। वहां से बस पकड़कर सोलंग वैली पहुंच गए। चारों तरफ बर्फ की सफेद चादर बिछी
थी। पर्यटकों की भीड़, बच्चों की खिलखिलाहट और
दूर-दूर तक फैले बर्फीले पहाड़... दोनों घंटों वहीं घूमते रहे। कभी तस्वीरें
खींचते, कभी बर्फ के गोले बनाकर
एक-दूसरे पर फेंकते और कभी बस चुपचाप उन वादियों को निहारते रहते।
शाम होते-होते वे एक छोटे से होटल में ठहरे। खाना खाया और जब बिल चुकाने की
बारी आई तो आजाद ने जेब में हाथ डाला। अगले ही पल उसके चेहरे का रंग उड़ गया। "मेरा... मेरा पर्स और मोबाइल... दोनों गायब हैं!" उसने होटल के बाहर और आसपास लोगों से पूछताछ की, लेकिन कुछ पता नहीं चला। होटल मालिक ने अफसोस जताते हुए कहा, "साहब, आजकल बाजार में कुछ पॉकेटमार घूमते रहते हैं। शिकायत
भी कर दो तो ज़्यादा कुछ नहीं होता।" आजाद सिर पकड़कर बैठ गया। "बाप रे... पॉकेटमारों
के गढ़ दिल्ली में तो बच गया, लेकिन यहां आकर शिकार हो गया।" होटल मालिक हंसते हुए बोला, "साहब जी, अब कुल्लू भी
थोड़ा-बहुत दिल्ली जैसा हो गया है।"
आइमा ने शरारत से कहा, “चलो, अब जाओ... प्लेटें धोकर
बिल चुकाओ।”
“तुम्हारे पास तो पैसे
हैं न?”
“हैं... लेकिन दूंगी
नहीं।” वह आँखों में शरारत लिए बोली।
दोनों की यह नोकझोंक देखकर होटल मालिक भी अपनी हँसी नहीं रोक पाया। उसे यह पल इतना प्यारा लगा कि उसने मोबाइल निकालकर
उनकी बातचीत का छोटा-सा वीडियो बना लिया। सोच रहा था, घर जाकर अपनी पत्नी को दिखाएगा । बिल बारह सौ रुपये का था। अंत में जब आइमा ने अपनी
पर्स से पैसे निकालने लगी तो पाया कि उसके पास सिर्फ एक हजार रुपये बचे थे। होटल
मालिक ने वही पैसे ले लिए और बाकी छोड़ दिया। इतने में आइमा ने अपना मोबाइल
निकालना चाही, लेकिन उसके चेहरे की
मुस्कान भी गायब हो गई। "मेरा मोबाइल... ये भी नहीं
है!" अबकी बार आजाद और होटल
मालिक दोनों की हंसी एक साथ छूट गई। लेकिन आइमा सचमुच घबरा गई थी। मोबाइल उसके लिए सिर्फ एक फोन नहीं था। उसके
बिना उसे बेचैनी होने लगी। हाथ कांपने लगे। आजाद ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "शांत हो जाओ... मैं हूं न।"
घबराहट में आइमा ने झुंझलाकर आजाद को एक थप्पड़ मार दिया। आजाद कुछ पल के लिए
आश्चर्यचकित रहा गया। फिर भी मुस्कुराकर बोला, "मैं तुम्हारे साथ हूं ना... तुम्हें मुझ पर भरोसा है ना?" आइमा ने बिना कुछ कहे धीरे से सिर
हिला दिया। शायद इंसान की सबसे
बड़ी कमाई यही होती है कि मुश्किल वक्त में कोई उसके कंधे पर हाथ रखकर सिर्फ इतना
कह दे— "मैं हूं ना।" इतना सुन लेना ही कई बार जिंदगी से दोबारा लड़ने
की ताकत दे देता है।
कुछ देर बाद आजाद बोला, "मैंने पहले कई बार हिचहाइक करके सफर किया है। किसी पेट्रोल पंप या ढाबे पर
चलते हैं। वहां किसी ट्रक वाले से मदद मांग लेंगे।"
"क्या सच में ऐसा हो
जाएगा?" आइमा हल्के टेंशन में
सोचते हुए पूछा।
"मुझ पर भरोसा रखो"
आजाद समझाया।
आजाद होटल मालिक से आस पास ढाबा का पता पूछा। होटल मालिक बोला, "यहां से थोड़ी दूर एक ढाबा है। रात को बहुत सारे ट्रक
रुकते हैं। दिल्ली जाने वाला कोई न कोई मिल ही जाएगा।" दोनों रात करीब दस बजे उस ढाबे पर पहुंच गए। ठंडी हवा
चल रही थी। कोहरा भी धीरे-धीरे घना होता जा रहा था। सड़क किनारे कई ट्रक खड़े थे।
तभी पता चला कि यह सड़क दिल्ली को श्रीनगर से जोड़ती है। काफी पूछने के बाद एक ट्रक चालक तैयार हो गया। ट्रक
चालक वहां पराठे और देसी शराब पी रहा था।
आइमा पूछी "शराब पीकर ट्रक चला लीजियेगा?"
“अरे
ये तो दवा है, इससे ट्रक रात में smooth चलती है” ट्रक चालक ने जवाब दिया। “आपलोग पीछे बैठ जाना। ट्रक में रुई भरी है।” दोनों तुरंत मान गए। ड्राइवर ने ट्रक की तरफ इशारा करते हुए कहा, “आप लोग उस ट्रक में बैठ जाइए। कुछ देर बाद गाड़ी
निकलेगी।”
आधे घंटे बाद ट्रक चल पड़ा। रुई से भरा होने की वजह से अंदर ठंड कम लग रही थी।
आइमा के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। वह आश्चर्य होकर पूछी, "अगर ऐसे सफर किया जाए तो पूरा भारत
घूम सकते हैं।" आजाद हंस पड़ा, "बिल्कुल बहुत से ट्रैवलर
इसी तरह लिफ्ट लेकर पूरा देश घूमते हैं।" दिनभर की थकान थी। बातें करते-करते
दोनों कब गहरी नींद में सो गए, उन्हें खुद भी पता नहीं चला। सुबह आइमा की आंख खुली। उसने ट्रक के पर्दे हटाकर
झांका तो अभी भी चारों तरफ सिर्फ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ दिखाई दे रहे थे। उसे कुछ समझ
नहीं आया। उसने आजाद को जगाया। नींद में ही आजाद बोला, "शायद रात में ट्रक कहीं रुका होगा... फिर चलना शुरू
हुआ होगा।" आइमा ने भी यही सोचकर दोबारा आंखें बंद कर लीं। करीब ग्यारह बजे
ट्रक एक बड़े बाजार में जाकर रुका। बाहर काफी चहल-पहल थी। इस बार आजाद की नींद
खुली। उसने पर्दा हटाकर बाहर देखा और एकदम चौंक गया।
"ये... ये तो श्रीनगर
है!" उसके चेहरे का रंग बदल
गया। तभी उसे समझ आया कि रात की जल्दबाजी में वे दिल्ली जाने वाले ट्रक की जगह
श्रीनगर जाने वाले ट्रक में बैठ गए थे। अब वह धीरे से आइमा को डरते डरते जगाने लगा। "सुनो... तुम्हारे जन्मदिन
का तोहफा नहीं दे पाया था न?" आइमा आधी नींद में बोली, "पहले मुझे मोबाइल दिला दो, वही सबसे बड़ा गिफ्ट होगा।"
"मोबाइल बाद में। पहले ये देखो... हम श्रीनगर पहुंच चुके हैं।"
"क्या...? श्रीनगर!"
उसी समय ट्रक चालक ने पीछे का पर्दा हटाया। दोनों उसे देखकर बच्चों की तरह
दांत निकालकर खिलखिलाने लगे। ड्राइवर भी हंस पड़ा, "अरे भाई साहब! आप तो दिल्ली जाने वाले ट्रक की तलाश कर रहे थे। मेरे ट्रक में
कैसे बैठ गए?" आजाद ने सिर खुजलाते
हुए सारी गलती बता दी। ड्राइवर जोर से हंसा, "कोई बात नहीं साहब जी। अब जब
श्रीनगर आ ही गए हैं तो घूम लीजिए। पास में ही डल झील है। इतनी दूर आकर बिना देखे
लौटना तो बिल्कुल बेईमानी सी होगी।" दोनों ट्रक वाले भाई साहब का धन्यवाद करके वहाँ से आगे बढ़ गए। आइमा ने उदास
होकर कहा, "अब तो पर्स में एक भी
पैसा नहीं बचा।"
आजाद मुस्कुराया, "ऐसे उदास नहीं होते, आइमा। हम इस सफर पर अपनी उदासी छोड़ने निकले हैं, उसे साथ लेकर नहीं। लेकिन अब लगता है हमें यहीं से
दिल्ली लौटना पड़ेगा। तुम यहीं रुको, मैं किसी ट्रक वाले से बात करता हूँ।" इतना सुनते ही आइमा ने उसका हाथ पकड़ लिया, "मेरी एक दिली तमन्ना है...
डल झील घूमने की और शिकारे पर बैठने की। बिना वहाँ गए मैं वापस नहीं जाना
चाहती।" आजाद कुछ पल चुप रहा।
उसके मन में बस एक ही सवाल घूम रहा था—पैसों का इंतज़ाम कैसे होगा? अनजाने में उसके होंठों से भी यही निकल गया, "पैसे कहाँ से जुगाड़ करूँ?"
आइमा की आँखों में शरारत चमकी। "मेरे पास एक आइडिया
है।" आइमा बोली।
"बताओ।"
"नहीं... कान में
बताऊँगी।" आजाद झुक गया।
आइमा धीरे से बोली, "अगर हम दोनों पूरे दिन भीख माँगें, तो कितने पैसे मिल जाएँगे?"
एक पल के लिए आजाद का चेहरा ऐसा हो गया कि न हँसी निकल रही थी, न गुस्सा और न ही समझ आ रहा था कि जवाब क्या दे। फिर
वह भी उसके कान के पास जाकर फुसफुसाया, "ऐसा नहीं कर सकते... कहीं इनकम टैक्स वाले पकड़ न लें।" आइमा ने तिरछी नज़र से उसे देखा और हल्का-सा मुँह बना
लिया,
"बहुत मज़ाकिया हो गए हो।" फिर उसने दोनों के बैग खोलकर देखने शुरू किए कि कहीं कुछ काम की चीज़ मिल जाए।
अपने बैग में रखे कपड़ों के बीच उसे पाँच सौ रुपये का एक नोट मिला। फिर उसने आजाद
का बैग खोला। उसमें उसकी लिखी हुई दो किताबें रखी थीं। उसने किताबें उठाकर कहा, "ये बेच देते हैं। पैसे भी आ जाएँगे।" आजाद हँस पड़ा, "हाँ, और इसके लिए इनकम टैक्स वाले भी नहीं पकड़ेंगे।"
यह कहते हुए उसने प्यार से आइमा के सिर पर टपली मार दी। आइमा ने भी उसके कंधों पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए गुनगुनाने लगी—
"उलझन भी हूँ तेरी,
उलझन का हल भी हूँ मैं।
थोड़ा-सा ज़िद्दी हूँ,
थोड़ा पागल भी हूँ मैं।"
आजाद हँसते हुए बोला, "थोड़ा-सा नहीं... कुछ ज़्यादा।" दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
सबसे पहले उन्होंने नाश्ते में सीरमल और नून चाय मँगाई। दोनों पहली बार नून
चाय पी रहे थे। कश्मीर की यह प्रसिद्ध गुलाबी चाय अपने हल्के नमकीन स्वाद और
क्रीमी रंग के लिए जानी जाती है। पहले घूँट पर दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
स्वाद उनके लिए बिल्कुल नया था। नाश्ता करके दोनों लाल चौक पहुँच गए। आजाद बोला
यार मुझे अपनी किताब बेचना नहीं चाहिए, ये मैने खुद के लिए लिखा था। आइमा समझाई - ये तो अच्छी बात है न, तुम्हारी किताब दुनिया पढ़ेंगी।
कॉपीराइट और रजिस्ट्रेशन करवा रखी है ना?
"हां, ये तो हो रखी है" आजाद ने बताया।
"तब क्या, अब बेचो" आइमा खुश होकर बोली।
आजाद अपनी किताबें लेकर लोगों को दिखाने लगा। करीब आधे घंटे बाद वहाँ से गुजर
रहे जम्मू विश्वविद्यालय के एक इतिहास के प्रोफेसर की नज़र उन किताबों पर पड़ी।
उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, "किताब बेचने के लिए दो लोगों की ज़रूरत पड़ती है क्या?" आइमा ने हँसते हुए अपनी पूरी कहानी सुना दी— पर्स
चोरी होने से लेकर डल झील देखने की ज़िद तक। उनकी बात सुनकर प्रोफेसर खिलखिलाकर
हँस पड़े। "आज मेरे एक दोस्त का जन्मदिन है। वह समाजशास्त्री है। एक किताब उसे
उपहार दे दूँगा और दूसरी मैं खुद पढ़ूँगा।" उन्होंने बिना मोलभाव किए दोनों
किताबें खरीद लीं। पैसे हाथ में आते ही आजाद थोड़ा चौड़ में आकर बोला, "यार, मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरी किताबें इतनी जल्दी
बिक जाएँगी। लगता है अब सच में लेखक बन जाना चाहिए।" आइमा हँसते हुए बोली, "सपने देखने के लिए अभी बहुत जल्दी है। रात होने दो, फिर आराम से देख लेना।" दोनों फिर हँस पड़े। शेयर टैक्सी पकड़कर वे डल झील
पहुँच गए। सामने फैली शांत झील, दूर बर्फ़ से ढके पहाड़ और पानी में तैरते रंग-बिरंगे शिकारे...। डल झील सचमुच
कश्मीर का वह ताज लग रही थी, जैसे शिव के मुकुट पर सजा चाँद।
दोनों शिकारे पर बैठ गए। आजाद अपने कैमरे से आइमा की कई तस्वीरें लेने लगा।
कुछ देर बाद आइमा ने शिकारा चला रहे भाई साहब से कहा, "हमारी भी तस्वीर खींच दीजिए।" उन्होंने कैमरा
लिया और दोनों की कई खूबसूरत तस्वीरें खींच दीं। शिकारे पर फल और फूल बेचने वाले
भी आते-जाते रहे। कीमतें थोड़ी ज़्यादा थीं, फिर भी दोनों ने थोड़े-से फल खरीद लिए। एक-दूसरे को
खिलाते हुए तस्वीरें खिंचवाईं और उन पलों को हमेशा के लिए यादों में कैद कर लिया।
शाम होने को थी। सूरज की आख़िरी किरणें पहाड़ों के पीछे उतर रही थीं।
"हमें अब जल्द ही श्रीनगर से दिल्ली के लिए निकलना होगा," आज़ाद ने घड़ी देखते हुए कहा।
दोनों सड़क किनारे एक ढाबे पर रुक गए। आज़ाद ने बातों-बातों में एक ट्रक ड्राइवर
को हिचहाइकिंग के लिए मना लिया। संयोग से वही ट्रक सीधे दिल्ली जा रहा था। ट्रक
में कश्मीरी शॉल लदी थीं, जिन्हें दिल्ली के बाज़ारों में पहुँचाना था। दोनों ने रास्ते के लिए कुछ खाना
पैक करवाया और वहीं बैठकर नाश्ता करने लगे।
तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी—"आज़ाद?" आवाज़ जानी-पहचानी थी। आज़ाद ने सिर उठाया, "विशाल.." एक पल के लिए
दोनों की नज़रें मिलीं, फिर आज़ाद ने नज़रें झुका लीं। "अरे यार! तुम यहाँ?" विशाल ने चौंककर पूछा। "हाँ... कुछ पर्सनल काम से आया था। अब वापस दिल्ली जा रहा हूँ।" विशाल ने
कुछ पल उसे गौर से देखा, जैसे उसके चेहरे पर लिखी कोई अधूरी कहानी पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। "और प्रोजेक्ट?" विशाल पूछा। आज़ाद ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके सामने रखी चाय
ठंडी होने लगी। तभी आकांक्षा बोली, "तुम जानते हो ना इसकी क्या कीमत
चुकानी पड़ी है? इस साल का पूरा
प्रोजेक्ट अब तुम्हारे हाथ से निकल चुका है। तुम्हारी जगह किसी और का चयन हो
गया।" उसने यह बात बिल्कुल शांत स्वर में कही, लेकिन उसके हर शब्द का भार साफ़ महसूस हो रहा था। आज़ाद बोला, "अंदाज़ा तो था... लेकिन इतना जल्दी सब तय हो जाएगा, ये नहीं जानता था।" विशाल ने हैरानी से पूछा, "लेकिन तुमने तो खुद पहल करके इस
प्रोजेक्ट के लिए गृह मंत्री तक बात की थी। फिर अचानक गायब क्यों हो गए थे?"
इतनी देर से आइमा चुपचाप सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर उलझन साफ़ दिखाई दे रही
थी। आज़ाद ने उसकी ओर देखते हुए कहा, "आइमा... ये विशाल और आकांक्षा हैं। हम तीनों पहले छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद पर
रिसर्च प्रोजेक्ट के दौरान मिले थे। अब हमें जम्मू-कश्मीर में भी आतंकवाद पर एक
रिसर्च करनी थी... लेकिन मैंने मना कर दिया।" विशाल हल्के गुस्से में बोला, "मना नहीं किए आप, आपने छोड़ दिया बिना कुछ बताए।" लेकिन आकांक्षा ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तो आप हैं आइमा?"
आइमा ने सिर हिलाकर "हाँ" कही। आकांक्षा ने विशाल की तरफ़ देखा और मुस्कुराकर बोली, "अब समझ में आया हमारे भारती जी
छत्तीसगढ़ में भी कहाँ खोये रहते थे और ये प्रोजेक्ट भी क्यों छोड़ा।" फिर उसने दोनों को देखते हुए कहा, "खैर... अब जो हुआ सो हुआ, तुम दोनों इस सफ़र को खुलकर जीना।" विशाल ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "लेकिन इस फैसले की कीमत आज़ाद को
बहुत महँगी पड़ी है।" आकांक्षा मुस्कुरा कर बोली "मोहब्बत ऐसा नशा है, विशाल... जिसमें कोई महँगा-सस्ता नहीं देखता।" फिर आकांक्षा ने आइमा को गले लगाया और बोली "best choice ……. you
chose well, चलो हमें भी निकलना
चाहिए।" इतना कहकर विशाल और आकांक्षा वहाँ से चले गए।
कुछ देर बाद ट्रक भी चल पड़ा। उस वक्त उसमें एक ग़ज़ल बज रही थी। दोनों पीछे
रखे कश्मीरी शॉलों के बीच आमने-सामने बैठ गए। दोनों के बीच एक गहरी ख़ामोशी पसरी
हुई थी। आइमा लगातार आज़ाद को
देख रही थी। आज़ाद की आँखें झुकी हुई थीं, जैसे वह किसी सवाल से बच रहा हो। आइमा की आँखों में
धीरे-धीरे नमी उतर आई। "मेरे लिए..." उसने बस इतना
कहा और आगे के शब्द उसके गले में अटक गए। आज़ाद चुप रहा। आइमा की आँखों से आँसू
बह निकले। आजाद उठकर उसके बगल में आकर बैठ गया। आज़ाद ने धीमे स्वर में कहा, "ऐसे नहीं रोया
करो। हम इस सफ़र पर सिर्फ इसलिए निकले थे कि तुम्हारे दिल का बोझ थोड़ा हल्का हो
जाए। मैं बस चाहता था कि तुम्हारा वो अकेलापन, जो इतने दिनों से तुम्हें खाए जा रहा था... कुछ कम हो
जाए। हमारी ये यात्रा बहुत खूबसूरत रही है। इसे आँसुओं की याद नहीं बनने दो।"
आइमा ने भीगी आँखों से उसकी तरफ़ देखा, "लेकिन मैं ये भी नहीं चाहती
थी कि मेरी वजह से तुम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लो।" आज़ाद हल्का-सा मुस्कुराया, "कुल्हाड़ी? तुमने कभी कुल्हाड़ी देखी भी है?" वह माहौल हल्का करना चाहता था। "मैं सीरियस हूँ, आज़ाद..." उसकी
आवाज़ थरथरा कर बोली। कुछ पल रुककर उसने पूछा, "तुमने... सिर्फ़ मेरे लिए उस प्रोजेक्ट से हट गए न?" आज़ाद ने उसकी तरफ़ देखा। उसके
होंठ हिले... लेकिन कोई शब्द बाहर नहीं आया। उसकी ख़ामोशी ही उसका सबसे सच्चा जवाब
थी। उस वक्त ट्रक पर गजल बज रही थी :-
“झुकी
झुकी सी नज़र,
बे-क़रार है कि नहीं,
दबा दबा सा सही,
दिल में प्यार है कि नहीं”
आइमा धीरे से आज़ाद के सीने पर अपना सिर रख देती है। कुछ देर तक सिर्फ़ ट्रक
के इंजन और ग़ज़ल की आवाज़ सुनाई देती रही। फिर वह बहुत धीमे स्वर में पूछती है— "अगर... मेरी इतनी परवाह थी... और मोहब्बत करते हो... तो मेरे भगवानपुर जाने के
बाद एक बार भी फोन क्यों नहीं किया?" आज़ाद कुछ देर तक चुप रहा, जैसे जवाब देने से पहले अपने भीतर के हर शब्द को
टटोल रहा हो। फिर उसने कहा— "मोहब्बत थी या नहीं...
इसका यक़ीन मुझे आज भी नहीं पता है। लेकिन उस वक़्त तुम्हें फोन करना मुझे ज़रूरत
से ज़्यादा क़रीब आना लगा। डर था... कहीं तुम मेरे बारे में ग़लत न सोचो।" कुछ पल की ख़ामोशी के बाद आज़ाद ने पूछा— "लेकिन तुम भी तो फोन कर सकती थीं। मुझसे ज़्यादा अकेलापन तो तुम झेल रही
थीं।" आइमा हल्के गुस्से में
बोली, "हाँ... कर सकती थी।
लेकिन मुझे पता है कि तुम्हें फोन पर लंबी बातें करना पसंद नहीं है।"
आज़ाद ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा, "तुम्हें ये कैसे पता?" आइमा मुस्कुराई, "क्योंकि... मैं तुमसे
मोहब्बत करने लगी हूँ। इसलिए तुम्हारी छोटी-छोटी बातें भी समझने लगी हूँ।" फिर उसने शरारत भरी नज़र से पूछा, "और तुम भी, अगर ऐसा नहीं है... तो मेरे फोटो अपने एनालॉग कैमरे
से भगवानपुर में चोरी छुपे क्यों खींचे थे?" आज़ाद फिर हैरान रह गया, "तुम्हें... इन तस्वीरों के बारे में कैसे पता?"
"कैसे पता, ये ज़रूरी नहीं है, आज़ाद। ज़रूरी ये है कि आज पहली बार तुम भी अपने दिल
की बात कह दो।" आज़ाद कुछ देर चुप रहा, "मैं तुम्हें पसंद करता
हूँ... तुम्हारी बहुत परवाह करता हूँ। लेकिन इसे मोहब्बत कहूँ या नहीं... मैं आज
भी नहीं जानता। शायद मैं दोस्ती और प्यार के बीच का फ़र्क अभी तक समझ ही नहीं पाया
हूँ।" आइमा ने हल्की मुस्कान के साथ उसका हाथ थाम लिया। "मैं जितना समझती हूँ, उससे तो यही लगता है कि हम दोनों एक-दूसरे से मोहब्बत करते हैं। हर एहसास को
दिमाग़ से नहीं, कभी-कभी दिल से भी
समझना पड़ता है।"
आज़ाद ने गहरी साँस ली। "मुझे थोड़ा वक़्त दो, आइमा... अपने मन को समझने के लिए।"
"ठीक है," आइमा ने मुस्कुराकर कहा, "लेकिन एक वादा करो... अब खुद से या
मुझसे कहीं खो ना जाना।"
आज़ाद ने बिना कुछ कहे बस हल्के से सिर हिला दिया।
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2.3
लगातार लगभग बीस घंटे के सफ़र के बाद अगले दिन ढलती दोपहर में दोनों दिल्ली
पहुँचे। ट्रक से उतरते हुए आज़ाद ने लंबी साँस ली। "मैं बहुत थक गया हूँ। अब हमें अपने-अपने फ्लैट चले जाना चाहिए। वैसे भी
तुम्हारी इंटर्नशिप शुरू होने वाली है।" आइमा कुछ पल उसे देखती रही, "अब... हम कैसे मिलेंगे?" आज़ाद जैसे कहीं खो गया था। उसने कोई जवाब नहीं दिया। आख़िरकार आइमा ने ही ख़ामोशी तोड़ी, "कल शाम पाँच बजे... इंडियन कॉफी
हाउस में मिलते हैं?" आज़ाद ने बिना कुछ कहे
बस हां में सिर हिला दिया। दोनों अपने-अपने रास्ते चल पड़े।
अपने फ्लैट पर पहुँचते ही आज़ाद की नज़र दरवाज़े के बाहर पड़े एक पार्सल पर
गई। उसने उसे खोला अंदर एक आधिकारिक पत्र था। उसके भारत सरकार के साथ इस वर्ष के
सभी प्रोजेक्ट तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिए गए थे। आज़ाद कुछ देर तक उस पत्र को
देखता रहा। उसने गहरी साँस ली, पत्र को टेबल पर रखा और बिना कुछ सोचे बिस्तर पर लेट
गया। कई दिनों की थकान और भीतर के उलझन की थकान ने उसे पल भर में नींद के हवाले कर
दिया। उधर, आइमा अपने फ्लैट में थी। उसके मन
में एक ही बात बार-बार घूम रही थी। उसे लग रहा था कि आज़ाद ने उसके लिए अपना करियर
दाँव पर लगा दिया... और उसके कारण सारे प्रोजेक्ट उससे छिन गए।
अगली शाम आज़ाद इंडियन कॉफी हाउस पहुँचा। आइमा पहले से ही एक कोने की मेज़ पर
बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी। आज़ाद को देखते ही उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ
गई।
"थोड़ा लेट हो गया...
सॉरी," आज़ाद कुर्सी खींचते
हुए बोला।
"कोई बात नहीं,"
आज़ाद मेन्यू उठाने ही वाला था कि आइमा मुस्कुराकर बोली, "ऑर्डर मैं पहले ही दे चुकी
हूँ।"
"अच्छा! क्या मंगवाया है?"
"एक कॉफी, एक चाय और दो सैंडविच। कुछ और चाहिए?"
आज़ाद ने हैरानी से पूछा, "दो कॉफी या दो चाय क्यों नहीं?"
"क्योंकि तुम्हें कॉफी
पसंद नहीं है। इसलिए तुम्हारे लिए चाय मंगवाई है, और मुझे कॉफी पीना था।"
आज़ाद कुछ पल उसे देखता रह गया। "यार... तुम्हें मेरी
इतनी छोटी-छोटी बातें कैसे पता हैं? मैंने तो कभी भी नहीं बताया।" आइमा हल्का-सा मुस्कुराई, "जब तुम मुझसे बात करते हो न, तो शब्दों से कम और अपनी आँखों और हरकतों से ज़्यादा
बोलते हो। तुम कहीं खो जाते हो। जो बातें ज़ुबान नहीं कहती, वो तुम्हारा चेहरा बता देता है।"
आज़ाद हँस पड़ा। "अच्छा! मतलब ये कोई बड़ी बीमारी है?" आइमा के शरारती दिमाग ने कहा, “हाँ, बीमारी तो है... जिसका नाम है मोहब्बत।”
"कुछ भी बोलती रहती
हो।" आज़ाद ने बात बदलते हुए पूछा, "अच्छा छोड़ो, ये बताओ... तुम्हारी
इंटर्नशिप कैसी रही?"
"पहले तुम बताओ। आगे का
क्या प्लान है? तुम्हारे तो सारे
प्रोजेक्ट कैंसिल हो चुके हैं।" आइमा ने पूछा। आज़ाद ने गहरी साँस ली और बोला "अरे, छोड़ो भी... रात गई, बात गई।"
"नहीं, छोड़ने वाली बात नहीं है। तुम्हारे माथे पर टेंशन
साफ़ दिख रही है।" आइमा चिंता जताते हुए बोली।
कुछ पल चुप रहने के बाद आज़ाद बोला, "मुझे खुद नहीं पता कि आगे क्या करना है।" तभी वेटर चाय, कॉफी और सैंडविच मेज़ पर रख गया। दोनों ने अपने-अपने
कप उठाए और एक-एक घूँट लिया। कुछ पल तक सिर्फ़ खामोशी उनके बीच बैठी रही।
फिर आज़ाद बोला, "ख़ैर, ये सब छोड़ो... मैं तुम्हें एक बात बताना चाहता
था।"
"हाँ, बोलो। मैं सुन रही हूँ।"
"देखो, इस दुनिया में कोई भी इंसान अकेले नहीं रहना चाहता।
हर किसी को किसी न किसी की ज़रूरत होती है।"
आइमा तुरंत मुस्कुरा पड़ी, "जैसे हम दोनों अकेले नहीं रहना चाहते... तो हमें शादी कर लेनी चाहिए।"
आज़ाद ज़ोर से हँस पड़ा। "कट्टा कहाँ गया मेरा? अभी यहीं ढेर कर दूँगा अगर फिर बीच में बोली
तो।" दोनों हँस पड़े। "कुछ भी सोच लेती हो।"
"ठीक है बाबा... अब नहीं
बोलूँगी।"
"सुनो, ध्यान से।"
"जी, पूरे कान खुले हैं।"
"आइमा..."
"सॉरी," उसने मुस्कुराकर कहा, "बस तुम्हें हँसाना चाह रही
थी।"
"ही ही ही… हो गया... अब ध्यान से
सुनो।"
आज़ाद कुछ क्षण सोचता रहा, फिर धीरे-धीरे बोलने लगा, “जब इंसान जन्म लेता है, तो उसके आसपास रिश्ते बनने लगते हैं। भाई-बहन के साथ वह बचपन से ही रिश्तों को
समझना और उन्हें निभाना सीखता है। फिर एक समय आता है, जब बहन की शादी हो जाती है और पहली बार घर में एक
खालीपन महसूस होता है। उस खालीपन को विवाह के ज़रिए एक नया रिश्ता भर देता है।
जीवन आगे बढ़ता रहता है, लेकिन उम्र के आख़िरी पड़ाव पर जब जीवनसाथी भी साथ छोड़ देता है, तब इंसान फिर अकेला पड़ जाता है। ऐसे समय में बच्चों
को सिर्फ़ अपने माता-पिता की संतान बनकर नहीं, बल्कि उनका दोस्त बनकर भी उनके साथ खड़ा होना चाहिए।”
आइमा की आँखें नम हो गईं। "मैं समझ रही हूँ...
शायद यही बात मैं कभी समझ ही नहीं पाई।" वह कुछ पल रुकी, फिर बोली, "शायद हम सबको ये बातें समय रहते समझ नहीं आतीं।" उसने मुस्कुराकर आज़ाद की तरफ़ देखा, "थैंक यू, आज़ाद, मेरे जन्मदिन का तुमने मुझे सबसे कीमती गिफ्ट दिया
है। मैं आज ही पापा से बात करूँगी। उनके साथ सिर्फ़ पिता-बेटी का नहीं, बल्कि दोस्ती का रिश्ता भी बना सकूँ।"
"उम्मीद है तुम इस
रिश्ते को पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश करोगी।"
"कोशिश नहीं...
निभाऊँगी।"
दोनों ने अपने सैंडविच खत्म किए। बाहर देखा तो शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही
थी। आज़ाद बोला, "चलो, अब निकलते हैं। रात होने लगी है। दिल्ली में इस समय
प्रदूषण भी बढ़ जाता है, और तुम्हें भी देर नहीं करनी चाहिए।" दोनों कॉफी हाउस से बाहर आ गए। कुछ कदम साथ चलने के बाद आइमा ने पूछा, "यार... फिर मुलाकात कैसे होगी?" आज़ाद मुस्कुराते हुए बोला, "आजकल इसके लिए ज़्यादा मुश्किल
नहीं होती। इतना भी मुझे नापसंद नहीं है कि फोन पर बात नहीं कर सकूं। उसने अपना
मोबाइल निकाला और नंबर एक्सचेंज कर लिया।"
______
कल सुबह-सुबह आज़ाद का मोबाइल बज उठा। "क्या कर रहे हो?" आइमा ने मुस्कुराती हुई आवाज़ में
पूछा। "अभी सो रहा हूँ... अभी तो सिर्फ़
सात बजे हैं।" आज़ाद ने नींद में बमुश्किल जवाब दिया।
"एक घंटे में तैयार हो
जाना। मैं तुम्हें लेने आ रही हूँ।" आज़ाद आधी नींद में बोला, "लेकिन... कहाँ जाना है?" आइमा ने हल्की गंभीरता से पूछा, "तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?"
"तुम पर तो पूरा भरोसा
है, लेकिन तुम्हारे इस शरारती दिमाग़
पर बिल्कुल नहीं।" आइमा ज़ोर से हँस पड़ी
और बोली, "मैं आ रही हूँ... बस
पहुँचने ही वाली हूँ। तैयार रहना, नहीं तो जैसे हो, वैसे ही उठाकर ले
जाऊँगी।" फोन कटते ही आज़ाद सोच
में पड़ गया। आखिर कहाँ जाना है? सुबह-सुबह कौन-सी नई शरारत सोच ली है? करीब एक घंटे बाद दरवाज़े की घंटी बजी। आज़ाद ने
दरवाज़ा खोला तो सामने आइमा ट्रेडिशनल कपड़ों में खड़ी थी। उसे देखकर आज़ाद कुछ पल
के लिए बस देखता ही रह गया।
आजाद बोला, "अरे वाह, कितनी सुंदर कपड़े है।" आइमा हल्के तंज कसते हुए
बोली, “मतलब सिर्फ कपड़े सुंदर है, मै नहीं?”
"अरे आप भी कपड़े से
ज्यादा सुंदर लग रही है लेकिन पहले ये बताओ, तुम्हारे इस शरारती दिमाग़ में क्या चल रहा है?" उसने पूछा।
"अभी कुछ मत पूछो," आइमा ने कहा, "नीचे कैब खड़ी है और उसका बिल भी
चल रहा है। जल्दी से कुर्ता-पायजामा पहन लो।"
"अरे मैडम, बाहर इतनी ठंड है। कुर्ता-पायजामा पहनकर तो मैं जम
जाऊँगा।"
"ऊपर से जैकेट पहन लेना।
बहाने मत बनाओ, जल्दी करो।" आइमा के आगे आज़ाद की एक न चली। कुछ ही देर में वह नहा
धोकर कुर्ता-पायजामा और जैकेट पहनकर तैयार हो गया। दोनों कैब में बैठ गए। कुछ देर बाद आज़ाद ने
ड्राइवर से पूछा, "भाई साहब, हम कहाँ जा रहे हैं?" ड्राइवर मुस्कुराया, "सर, मुझे बताने के लिए मना किया गया है।" अब आज़ाद की उलझन और बढ़ गई। आइमा हँसते हुए बोली, "इतने बेचैन क्यों हो रहे हो? तुम्हारे एक दोस्त से मिलने जा रहे हैं।" "कौन-सा दोस्त?" आज़ाद के मन में सवालों
की कतार लग गई, लेकिन इस बार उसने कुछ
नहीं पूछा।
कुछ देर बाद कैब कनॉट प्लेस स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर के सामने आकर रुकी।
आइमा ने किराया चुकाया और दोनों मंदिर की ओर बढ़ गए। दिल्ली के हृदय कनॉट प्लेस में स्थित यह प्राचीन हनुमान मंदिर अपनी
धार्मिक महिमा के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के बाहर खड़े-खड़े आज़ाद ने पूछा, "इतनी सुबह-सुबह मंदिर क्यों आए हैं
हम?" अचानक आज़ाद के मन में
एक अजीब-सा ख़याल आया। कहीं... आइमा शादी की
बात करने तो नहीं लाई? उसने मंदिर के बाहर
खड़े पीपल के पेड़ की ओर देखा और मन ही मन पूछा, "क्या सच में ऐसा ही है?" उसी पल हवा का एक हल्का झोंका आया। पीपल के पत्ते
सरसराए, मानो सिर हिलाकर कह रहे
हों, "नहीं..."
आज़ाद सोचते हुए बोला, "आज तो मंगलवार भी नहीं है... फिर आज ही क्यों?" आइमा हल्की-सी डाँट लगाते हुए बोली, "अब बिना कोई सवाल किए बस चुपचाप
दर्शन करो।" दोनों मंदिर के अंदर गए। लगभग एक घंटे तक वे वहीं शांत बैठकर
प्रार्थना और आत्मध्यान किए। मंदिर से निकलते ही आइमा ने आज़ाद का हाथ पकड़ा और पास ही काकू कचौड़ी वाले की
दुकान पर ले गई। गरमागरम कचौड़ी की खुशबू पूरे वातावरण में फैली हुई थी। पहला कौर
मुँह में जाते ही उसका स्वाद जैसे थकान और उलझन दोनों को साथ ले गया। आइमा ने मुस्कुराकर पूछा, "तो... अब पूछो, क्या-क्या सवाल हैं तुम्हारे?" आजाद भी मुस्कुरा दिया, "अब कोई सवाल नहीं है।" धर्मस्थल किसी भी धर्म का क्यों न हो, वहाँ बैठते ही मन अपने-आप शांत हो जाता है। जैसे भीतर
का शोर धीरे-धीरे खाली होता जा रहा हो।
हालाँकि आज़ाद की आँखों में जिज्ञासा अभी भी साफ़ दिखाई दे रही थी। "अगर
तुम कुछ बताना चाहो... तो बता सकती हो।" आइमा थोड़ी झुकी और धीमी आवाज़ में बोली, "आज हम तुम्हारी किताब को मार्केट
में लॉन्च करने की तैयारी शुरू करेंगे।" आज़ाद के हाथ का कचौड़ी का टुकड़ा जैसे वहीं रुक गया। "ये... अभी कैसे हो सकता है? मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं।"
"तो मैं दे देती
हूँ।"
"और तुम्हें लगता है कि
मैं ले लूँगा?"
"मुझे पता है, तुम सीधे कभी नहीं लोगे।"
"लेकिन तुम्हारे मन में
ये सब ख़याल आया ही क्यों?"
"तुम्हारी वजह से।" उसने अपने बैग से एक छोटा-सा लिफाफ़ा निकाला और आज़ाद
की तरफ़ बढ़ा दिया। "कल मेरे पापा से लंबी बात हुई। मैंने उन्हें पूरे ट्रिप
के बारे में बताया... और यह भी बताया कि मेरी वजह से तुम्हारे इस साल के सारे
प्रोजेक्ट रुक गए। उन्होंने कहा कि तुम्हारी किताब जल्दी प्रकाशित होनी चाहिए, ताकि तुम्हें आर्थिक परेशानी न हो। ये दो लाख रुपये
उन्होंने ही भेजे हैं। इसे मदद मत समझना। इसे उधार समझो। किताब बिकने लगे तो आराम
से उन्हें वापस कर देना।" कुछ पल के लिए आज़ाद बिल्कुल शांत हो गया। उसकी आँखों में कृतज्ञता साफ़ दिखाई
दे रही थी। आइमा ने नज़रें झुका लीं, “….अब ज़्यादा भावुक मत बनो। पहले कचौड़ी खत्म करो, नहीं तो ठंडी हो जाएगी।” फिर दोनों ने एक दूसरे को कचौड़ी खिलाई।
आज़ाद कुछ देर सोचने के बाद बोला, “यार, लेकिन मुझे किताब
प्रकाशित करवाने और उसे बेचने-वगैरह का ज़रा भी आइडिया नहीं है”। आइमा बताई, “Don't
worry, मेरे psychological
field में
कई दोस्तों ने किताबें प्रकाशित की हैं। I have lots of networks and connections. सब कुछ हो जाएगा। बस
तुम मेरे साथ रहना।”
“मैं हूँ,” आज़ाद ने कहा।
आइमा ने कुछ पल उसे देखा, फिर पूछा, “तो तुम पैसे कैसे कमाते
हो? मतलब, घर-बार कैसे चलता है? और... गृह मंत्री से तुम्हारा संपर्क है, यह तो बहुत बड़ी बात है।”
आज़ाद हल्का-सा मुस्कुराया। “मेरा ऐसा कोई प्लान नहीं था कि मैं Sociologist बनूँगा और सरकार के साथ काम
करूँगा। मुझे बस लोगों से मिलना और उनके बारे में जानना हमेशा से बहुत अच्छा लगता
था। इसलिए मैं अलग-अलग राज्यों के कई समाजों और समुदायों के बीच जाने लगा। वहाँ की
ज़िंदगी, उनकी परंपराओं और
समस्याओं के बारे में documentation तैयार करता था। एक दिन किसी ने बताया कि मुझे इसे अख़बार में लिखना चाहिए। फिर
मैंने एक संपादक से संपर्क किया और लिखना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वहाँ से थोड़ी
बहुत कमाई होने लगी कि घर-बार चल जाए। शायद वहीं से किसी ने मेरा नाम गृह मंत्री
साहब तक पहुँचा दिया होगा। वरना मुझे कौन ही जानता है। शायद उन्हें मेरा काम पसंद
आया होगा। उन्होंने ही मुझे Sociologist का नाम दिया और उनके साथ कई प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिला। “सरकार को जिसकी ज़रूरत होती है, उसे वह खुद ही खोज लेती है।”
“तो अब आगे का क्या सोचा
है?” आइमा ने पूछा।
“वापस पंजाब ही लौटूँगा।
वहाँ कुछ काम पेंडिंग है और थोड़ा-बहुत documentation बचा है।”
“तो अच्छी बात है। जब
किताब छप जाएगी, तब हम दिल्ली में स्टॉल
लगाकर बेचेंगे। मज़ा आएगा।” आइमा के चेहरे पर शरारती मुस्कान थी।
“थोड़ा बचपना नहीं लगेगा? लेकिन ठीक ही है।“
“तो तुम अपना काम पूरा
करके शाम में फ्री हो जाना। मैं भी अपनी इंटर्नशिप करके शाम में मिल लूँगी। फिर
कभी लोधी गार्डन, चाँदनी चौक, हौज़ खास, और कभी मजनू का टीला... वहाँ अपनी स्टॉल लगाएंगे।”
दोनों एक-दूसरे के सामने बैठे बाते कर रहे थे, लेकिन उनकी आँखें जैसे आसमान में कहीं खो गई थीं।
होंठों पर एक अनकही मुस्कान धीरे-धीरे ठहर रही थी। आसमान में दो बादल थे। कभी वे
एक-दूसरे से मीठी-मीठी बातें करते, कभी किसी छोटी-सी बात पर रूठ जाते। जब पहला बादल चुपके से दूसरे को अपने प्यार
का इशारा करता, तो दूसरा बादल शरमा
जाता। जब दूसरा बादल जब अपने मन की बारिश दूसरे पर बरसाना चाहता, तो पहले उसकी इजाज़त माँगता, तो पहला बादल नखरे दिखाते हुए उसे मना कर देता। दूसरा
बादल तुरंत सहम जाता—कहीं उसका यह नखरा सचमुच नाराज़ तो नहीं! फिर भी दोनों
एक-दूसरे के पास बने रहते। कभी कभी तो चाँद को निहारते-निहारते पूरी रात गुज़ार देते, तो कभी ठंडी हवा उन्हें और करीब ले आती। मौसम बदलते
रहे, आसमान बदलता रहा... मगर उन दोनों
बादलों के बीच कभी बारिश नहीं हुई। और इसी इंतज़ार में एक दिन अमावस्या की रात
धीरे-धीरे पूर्णिमा में बदल गई।
2.4
रात के करीब दो बज रहे थे। फ्लैट की डोरबेल बजी। आज़ाद कलम को डायरी के बीच रखकर कुर्सी से उठा और
दरवाज़ा खोला तो सामने आइमा खड़ी थी। "तुम यहाँ... इतनी रात
को? क्या हुआ?"
आइमा के चेहरे पर खुशी थी। "एक खुशखबरी थी, तुम्हें बताने आई हूं।" आज़ाद कुछ समझ नहीं पाया। "पागल हो गई हो क्या? इतनी रात को आई हो! मुझे फोन कर देती, मैं आ जाता।" वह चिंता में बोला।
"ठीक है, मैं जा रही हूँ।" आइमा ने गुस्से से मुँह बनाते
हुए कहा और पलटने लगी। “अरे रुको! मैं तो बस तुम्हारी सुरक्षा के लिए बोल रहा
था।” आजाद उसका हाथ पकड़ते
हुए बोला। “तुम्हें
पता है ना, दिल्ली को रेप कैपिटल
तक कहा जाता है।”
आइमा अचानक पलटी। "और रेप कैपिटल बनाया किसने? पुरुष समाज ने ही ना? कभी उधर भी बोल दिया करो। तुम्हारी तो पहचान सरकार तक
है ना!" वह गुस्से में बोली। आज़ाद कुछ कह पाता, उससे पहले आइमा बोलती चली गई— "सरकार.... कानून बनाने वाले में खुद कुछ
रेपिस्ट या क्रिमिनल के आरोप लगते रहे हैं और और न्याय करने वाले जजेस patriarchal mindset के मारे है। तुमने सुना ही होगा, आजकल कुछ हाई कोर्ट के जज रेप जैसे मामलों पर
कैसे-कैसे बयान दे देते हैं।" आज़ाद चुप रहा। आइमा ने पूछा—
"पुरुष आखिर रेप करते क्यों हैं?"
आज़ाद ने कुछ पल सोचा और बोला – “मेरी समझ से यही लगता है कि कुछ पुरुषों के
लिए रेप सिर्फ स्त्री के शरीर को पाने की इच्छा तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें उस पर अपनी
सत्ता और अधिकार दिखाने की मानसिकता झलकती है। अगर किसी का मकसद सिर्फ शारीरिक
संबंध बनाना होता, तो
उसके पास इसके लिए दूसरे कानूनी रास्ते भी समाज में मौजूद हैं। लेकिन रेप सिर्फ
सेक्स नहीं है... उसमें हिंसा, नियंत्रण और दूसरे इंसान की इच्छा को कुचलना भी शामिल
होता है।”
आइमा कुछ पल चुप रही। आज़ाद ने बात बदलते हुए पूछा— "ये सब बातें बाद में, पहले ये बताओ, यहाँ कैसे आई?" आइमा ने उदास होकर इतने धीमे से कही कि आजाद अपनी कान
आइमा के मुंह तक लाना पड़ा। "बस से।" आज़ाद ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। "मतलब? रात के दो बजे तुम बस से आई? दिल्ली में रात में बसें चलती हैं?" "हाँ, कुछ बसें चलती हैं। मैं उबर से भी आ सकती थी, लेकिन मुझे थोड़ा अनुभव लेना था—दिल्ली की सड़कों का, वो भी रात में।" आइमा उत्साहित होकर बोली। आज़ाद ने एक भौंह उठाई। "तो कैसा रहा अनुभव?"
आइमा का चेहरा अचानक बदल गया। "वैसे तो मुझे कुछ नहीं हुआ, लेकिन अनुभव बहुत खराब रहा। मैं उत्साहित होकर बस में
बैठी थी और बाहर के नज़ारे देख रही थी। इसी चक्कर में तुम्हारे पास वाले स्टेशन पर
उतरने की बजाय छह स्टेशन आगे निकल गई। फिर ध्यान आया तो वहाँ उतर गई और वापस आने
वाली बस का इंतज़ार करने लगी।" मैं कुछ पल रुकी। "बस तुरंत मिल गई, लेकिन उसमें कोई यात्री नहीं था। सिर्फ ड्राइवर, कंडक्टर और एक गार्ड... तीनों पुरुष।" उसकी
आवाज़ धीमी हो गई। "अचानक मुझे निर्भया कांड याद आ गया। मेरे हाथ काँपने लगे।
जैसे-तैसे यहाँ पहुँची हूँ। और तुम ऊपर से इतना सवाल कर रहे हो... मुझे बिल्कुल
अच्छा नहीं लगा।"
आजाद के हर रोम यह सब
सुनकर जाग चुका था। उसके चेहरे की चिंता अब साफ दिखाई दे रही थी। उसने बिना कुछ
कहे आइमा को गले लगा लिया। "मुझे माफ कर दो। मुझे ऐसा नहीं बोलना चाहिए
था।" आइमा उसके सीने पर सिर
रखे रही और बोली - "यह सिर्फ तुम्हारी बात नहीं है। लगभग हर पुरुष से यही
सुनने को मिलता है। महिलाओं से ही पूछा जाएगा—रात को क्यों निकली थीं? कपड़े कैसे थे? किससे मिलने गई थीं? वहाँ क्या कर रही थीं?" थोड़ी देर शांत होकर दुबारा बोली - "मान लो घर
में टीवी पर रेप की कोई खबर चल रही हो। घर वाले अपनी बेटी या बहन से कहेंगे—'देखा, समाज कितना गंदा है, इसलिए बाहर मत निकला करो।' लेकिन कितने घरों में पुरुषों से कहा जाता है—'अगर तुम्हें कभी कोई लड़की रात में अकेली मिल जाए और
वह मुश्किल में हो, तो उसकी मदद करना। और
अगर मदद नहीं कर सकते तो कम से कम उसे परेशान नहीं करना'?"
आज़ाद के पास कोई जवाब नहीं था। "मैं अब क्या बोलूँ?" उसने धीरे से कहा। "कुछ नहीं बोल सकते। ये सब बाते तो हम महिलाओं के लिए रोज़ की कहानी है।" आज़ाद ने धीमे स्वर में कहा - "आई एम
सॉरी।" आइमा ने उसकी तरफ देखा।
"तुम्हारी फिलॉसफी इस बारे में क्या कहती है? अगर कोई गलती करे और सॉरी बोल दे, तो क्या उसे माफ कर देना चाहिए?" आज़ाद कुछ सोचकर बोला— "मेरी
फिलॉसफी यहाँ कुछ तय नहीं करती। माफ करना या न करना सामने वाले पर निर्भर करता
है।" आइमा नाराज़ होते हुए
बोली, "मेरी
फिलॉसफी तो यही कहती है कि अगर गलती पहली बार हुई हो, तो माफ कर देना चाहिए। लेकिन मैं तुमसे थोड़ी ज्यादा
उम्मीद करती हूँ। मुझे लगा था कि तुम इस मामले में थोड़ा ज्यादा संवेदनशील और
सकारात्मक नजरिया रखोगे। इसलिए मैं माफ नहीं करना चाहती।"
आज़ाद चुप रहा। "खैर छोड़ो" आइमा बोली। इन दो
शब्दों में न जाने कितने वाक्य रह गए। भारत में न जाने कब इस मुद्दे पर सरकार
बातें करेगी और समाज इस मुद्दे को समझेगा।
आइमा ने अचानक माहौल बदलते हुए कहा— "अच्छा, मैं तुम्हें कुछ बताने आई थी। तुम्हें याद है, श्रीनगर में एक प्रोफेसर मिले थे?" आज़ाद ने सिर हिलाते हुए हाँ बोला।
"जम्मू यूनिवर्सिटी के
वाइस चांसलर ने तुम्हारी किताब यूनिवर्सिटी के लिए recommend किया है। अब तुम्हारी किताब जम्मू
यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाएगी!" आज़ाद बस उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। आइमा ने हैरानी से कहा— "अरे! कुछ तो रिएक्ट
करो। इतनी बड़ी खुशखबरी है!" आज़ाद ने धीमे से कहा— "मुझे खुद पर शर्म आ रही है... मैं क्या बोलूँ?" आइमा ने उसके कमरे में चारों तरफ
देखा और बोली— "पता है, तुम्हारे कमरे में ही कोई दोष है। पूजा-पाठ करवाओ यार। मैं थोड़ा क्या बोलती
हूँ, तुम्हारा मूड ऑफ हो जाता है।"
आज़ाद हल्का-सा मुस्कुराया। आइमा ने तुरंत कहा— "चलो, तुम मेरे लिए स्पेशल हो। तुम्हारे लिए कुछ 50% ऑफर।" "मतलब?" आज़ाद ने पूछा।
"मतलब ये कि मैं 50% गुस्सा रहूँ। बाकी 50% गुस्सा तुम कम करा सकते हो... अगर मैं तुम्हें सज़ा
दूँ और तुम मान लो।" आइमा के चेहरे पर अब हल्की शरारती मुस्कान थी। आज़ाद भी मुस्कुराया। उसे मालूम था कि आइमा जिंदादिल
लड़की है उसका ये गुस्सा कम करना सिर्फ उसे बातों का भटकाना था। कोई भी लड़कीं इस
गलती को कभी माफ नहीं करेगी।
"बताओ, क्या सज़ा है?"
"मैं अभी आ रही थी न, रास्ते में एक पंजाबी शादी होने वाली है। चलो, हम उस वेडिंग में चलते हैं।" आज़ाद ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। "क्या? कुछ भी! तुम्हारी उनसे जान-पहचान है?"
"नहीं।"
"यार, तो फिर कैसे जा सकते हैं?"
आइमा ने दोनों पुतलियाँ ऊपर चढ़ाईं, एक भौंह तानी और रूठे हुए बोली— "देखो, मेरा गुस्सा ना बढ़ाओ अब। चलो, मैं ऑर्डर दे रही हूँ।" आज़ाद सिर हिलाकर चुपचाप हामी भर देता है। आइमा ने तुरंत मीशो से ऑनलाइन ड्रेस मँगवा ली और
आज़ाद अपने कमरे में जाकर ड्रेस पहनने लगा। दोनों तैयार हुए और आज़ाद ने उबर बुक
कर ली। कुछ ही देर बाद दोनों वेडिंग हाउस
पहुँच गए। शादी का माहौल पूरे रंग में था। बारात अभी निकलने ही वाली थी। ढोल की
आवाज़ के साथ आइमा ने आजाद को खुलकर बारात में नचाया। और फिर दोनों तरह-तरह के व्यंजनों
का स्वाद लेने लगे। कहावत है या नहीं, पता नहीं... लेकिन पंजाबी शादी हो और शराब न हो, तो फिर शादी कैसी! आइमा ने आज़ाद की तरफ़ ड्रिंक बढ़ाई।
"मैं शराब नहीं
पीता।"
आइमा ने उसे घूरते हुए कहा, "क्यों झूठ बोल रहे हो? हमने साथ में पहले पी रखी है।"
"कब?"
"तुम्हारे फ्लैट पर...
जब हम पहली बार मिले थे।"
आज़ाद को याद आया। "हाँ, तुमने
ही मँगाई थी। लेकिन तुमने पिया ही नहीं था तो वैसे ही पड़ी हुई है।"
आइमा ने नाक चढ़ाते हुए पूछी, "लेकिन मुझे पीनी है... मैं पी लूँ?"
"अगर तुम्हारा मन कर रहा
है तो पी लो। लेकिन उतना ही पीना जितना तुम खुद को संभाल सको। मुझे बिल्कुल अनुभव
नहीं है कि किसी को कैसे संभालते हैं।"
"बहुत बोलते हो!"
इतना कहकर आइमा ने गिलास उठा लिया और पीने लगी। करीब डेढ़ घंटे तक दोनों ने शादी का खूब आनंद लिया।
फिर आज़ाद वापस फ्लैट जाने के लिए उबर बुक करने लगा। आइमा ने अचानक कहा, "चलो न... रात में दिल्ली की सड़कों
पर गेड़ी मारते हैं।" आज़ाद ने उसकी तरफ़ देखा, "मैंने भी रात में दिल्ली को ऐसे नहीं देखा है, करते हैं।" दोनों वहाँ से निकल पड़े। रात की दिल्ली अपनी ही एक
अलग ख़ामोशी में डूबी हुई थी। कुछ देर बाद घूमते हुए दोनों कर्तव्य पथ की ओर निकल
गए। कर्तव्य पथ पर रात की ठंडी हवा चल रही थी। दोनों धीरे-धीरे टहलने लगे। दिनभर
की चहल-पहल के बाद दिल्ली का यह शांत रूप दोनों को भीतर तक सुकून दे रहा था। कर्तव्य पथ से आगे बढ़ते हुए दोनों इंडिया गेट की
तरफ़ निकल गए। रात की रोशनी में नहाए इंडिया गेट को देखते ही आइमा कुछ पल के लिए
रुक गई। “आज़ाद... एक फोटो लेते हैं।”
“इतनी रात में?”
“हाँ... इंडिया गेट के
पास।” दोनों ने सिर्फ़ साथ में तस्वीर
लिए। आइमा ने पहली बार अपनी अकेली तस्वीर नहीं खिचवाई। कुछ दूर चलने के बाद आइमा ने पूछा, “तुम्हें आज की रात में सबसे अच्छा क्या लगा?” आज़ाद ने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा, “तुम्हारा खुश रहना।” आइमा ने तुरंत उसकी तरफ़ देखा। “बस?”
“और क्या?”
“मुझे लगा तुम कहोगे...
मेरे साथ नाचना, खाना, घूमना, फोटो लेना...”
आज़ाद मुस्कुराया, “वो सब भी अच्छा था।
लेकिन तुम जब खुलकर हँसती हो न... तुम्हें देखकर उससे ज़्यादा अच्छा लगता है।” आइमा कुछ पल चुप रही। फिर धीमे से बोली, “तुम्हें कभी किसी बात का पछतावा हुआ है? ऐसा कि तुम्हें लगे—मुझे वो नहीं करना चाहिए था?”
"एक तो अभी जो रूम पर हो
गया।"
"इसके अलावा"
आज़ाद कुछ देर सोचता रहा, “बचपन के स्कूल में एक लड़की मुझे पसंद थी। उसका नाम
साहिबा था। वो मेरे गाँव की नहीं थी, लेकिन हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। एक बार स्कूल में किसी ने हम दोनों को
लेकर उसका मज़ाक बना दिया। वो रोने लगी थी। मुझे उसका यूँ रोना अच्छा नहीं लगा।
मेरा मतलब... मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से कोई रोए। उस दिन के बाद मैंने उससे बात तक नहीं की।”
“अब?”
“अब उसकी शादी हो चुकी
है। बहुत बाद में जब उससे मिला, तब पता चला कि वो भी मुझे पसंद करती थी।” ये मेरी ज़िंदगी का शायद सबसे बड़ा पछतावा है। “मुझे पता था कि जब वो पहली बार रोई थी, मुझे उसके पास जाकर बैठना चाहिए था। उससे बात करनी
चाहिए थी। लेकिन मैं नहीं कर पाया, पता नहीं क्यों...”। कुछ पल दोनों के बीच ख़ामोशी बनी रही। आज़ाद ने आगे कहा, “और सच कहूँ तो आज भी मैं वैसा ही हूँ। मैं लंबे समय
तक किसी के साथ नहीं रह पाता। किसी का मुझसे जुड़ जाना... उसका attachment... मुझे भीतर से बहुत परेशान करता
है।”
आइमा ने धीरे से पूछा, “और शायद इसलिए तुमने मेरे प्रपोज़ल को रिजेक्ट किया था?”
“शायद... ये भी एक वजह
हो सकती है। मैं अभी खुद को समझना चाहता हूँ। पुरुष और महिलाएं रिश्तों में सिर्फ provider बन के रह जाते है। जब तक मुझे ये
समझ नहीं आ जाता कि मैं रिश्ते में क्या चाहता हूँ?, सामने वाली क्या चाहती है?, हम एक दूसरे को लेकर क्या महसूस करते है?, तब तक किसी से जीवनभर का वादा कैसे कर सकता हूँ?”
आइमा ने मुस्कुराकर पूछा, “और ये feminine
energy कहाँ से लाओगे?” आज़ाद थोड़ा सोचते हुए
बोला, “लाऊँगा कहाँ से… पढ़ूँगा, सीखूँगा और समझूँगा। I love this feminine energy. I want to explore each
and every aspects of feminine energy. सभी लोगों में ये एनर्जी होनी ही चाहिए। फिर कुछ देर बाद उसने धीमे से कहा, “मेरे सवालों से तुम्हें जितना बुरा लगा था, शायद उतना ही मुझे भी लगा। तुम मुझे माफ़ करोगी या
नहीं, मुझे नहीं पता। लेकिन
मेरे लिए तो जीवन भर ये पछतावा रहेगा कि मैंने उस रात ऐसा क्यों कहा।”
आइमा ने उसकी तरफ़ देखा, “क्या तुम अभी तक वो सब याद रखे हो?”
“हाँ।”
“मैं तो कब की भूल गई।”
आइमा झूठ छिपाते हुए बोली।
वह हल्के से मुस्कुराई। “इतना ज़्यादा overthink नहीं करना चाहिए।” कुछ देर चुप रहकर फिर बोली, “कुछ महीने पहले हमारे पास एक केस आया था, IIT की तैयारी कर रहे एक लड़के ने अपने
माता-पिता को चिंता से बचाने के लिए अपनी बीमारी छिपा ली। बाद में पता चला कि उसे
चौथे स्टेज का ब्लड कैंसर है और शायद जिंदगी जीने के लिए सिर्फ चार-पाँच महीने ही
बचे हैं। हमारी टीम सीनियर्स और डॉक्टर उसके पिता को सलाह दिया— अब जितना समय है, उसे बेटे के साथ शांति और प्यार से बिताइए। “सोचो आज़ाद... इतने दिनों तक वो लोग पढ़ाई, नौकरी और करियर के भविष्य की चिंता करते रहे, और जब भविष्य सामने आया तो भविष्य ही नहीं बचा।” उसकी
आवाज़ भर्रा गई। “शायद हम सब ऐसे ही जीते हैं। जो आज हमारे पास है, उसे छोड़कर उस कल की चिंता करते हैं, पता नहीं वो आएगा भी या नहीं।”
आज़ाद ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, “हाँ... सही बात है। समय कभी भी सब कुछ बदल सकता है। शायद हमें इतने लंबे प्लान
नहीं बनाने चाहिए। भगवान ने भी कोई लिखित प्लान नहीं बनाया होगा... फिर भी दुनिया
चल रही है। हम इंसान हैं कि सत्तर साल की ज़िंदगी के लिए न जाने कितने सालों की
प्लानिंग कर लेते हैं।”
“छोड़ो ये सब बाते... हम
कहाँ इतनी गहरी बातों में घुस गए।”
“हाँ, छोड़ो यार,” आइमा ने कहा, “मैं बस कुछ कहना चाहती
थी।”
“बोलो।”
आइमा ने अपने बैग से एक लेटर पैड और कलम निकाली। “एक लेटर लिखो।”
"हमने नंबर एक्सचेंज कर लिए थे ना, तो फिर ये लेटर क्यों?"
"मुझे नहीं लिखना है बुद्धु, कौन तुम मुझसे दूर जा रहे हो।" ये बोलते हुए आइमा
ने आजाद के कुर्ते की कॉलर को अपने नजदीक खींची।
"फिर किसे लिखना है?"
“होम मिनिस्टर को, जिसमें तुम्हारे प्रोजेक्ट ज्वाइन नहीं करने के
सही-सही कारण लिखे हों।”
आज़ाद ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा, “लेकिन मैं ऐसा क्यों करूँ? मैं सरकार पर डिपेंडेंट नहीं हूँ। मैं अपने लिए काम करता हूँ। उन्होंने मुझे निकाला है, उनकी गलती है।” आइमा कुछ पल उसे देखती रही। “पता है, तुम समाज को पढ़ते-पढ़ते शायद खुद से बहुत दूर हो गए
हो।” आज़ाद चुप रहा, “तुम्हें पता ही नहीं कि तुम खुद कौन हो। और तुम फिर
वही गलती कर रहे हो, जो साहिबा, अपने टीम मेंबर्स विशाल
और आकांक्षा, और साथ ही होम मिनिस्टर
के साथ की थी।” आज़ाद ने उसकी तरफ़
देखा, “कम-से-कम किसी की
ज़िंदगी से निकलते समय उसे ये बताना तो चाहिए कि तुम वहाँ से क्यों निकले।
तुम्हारे साथ रहने वाले व्यक्ति का इतना हक़ तो बनता है।”
“फिर भी मैं नहीं करना
चाहता।” आज़ाद की आवाज़ में अब भी हिचक थी। “एक पल के लिए उन्हें मुझे नोटिस देना
चाहिए था। सीधे निकाल दिया। मैंने उनके साथ न जाने कितने प्रोजेक्ट्स पर काम किया
था।” आइमा ने शांत स्वर में कहा, “शायद उनके लिए कोई कारण उस समय ज़्यादा अर्जेंट रहा
हो। कश्मीर वाले प्रोजेक्ट की बात है न? शायद आतंकवाद की गिरावट पर होगी?” आज़ाद ने सिर हिलाया। “जैसे तुम्हारे लिए मुझे
उस समय उन्हें बिना बताए दिल्ली से बाहर ले जाना अर्जेंट लगा। उनके पास भी अपनी
वजह रही होगी। यहाँ बस communication gap हो गया। रिश्ते वही संभलते हैं, जहाँ communication
बना रहे।”
आज़ाद चुपचाप उसे सुनता रहा। पहली बार उसे महसूस हुआ कि बात सिर्फ़ उस
प्रोजेक्ट की नहीं थी। बात उसके उस स्वभाव की थी, जिसमें वह किसी भी रिश्ते या परिस्थिति से बिना कुछ
कहे पीछे हट जाता था। उसने आइमा के हाथ से
लेटर पैड और कलम लिया और कुछ देर खाली पन्ने को देखता रहा। फिर मन के शब्दावली से
जो जो शब्द निकले उससे वो लिखना शुरू कर दिया। वह अपने किए हुए हर काम, हर निर्णय और कश्मीर प्रोजेक्ट से अलग होने की पूरी
सच्चाई शब्दों में उतारता चला गया। लिखते-लिखते
अचानक उसकी कलम रुक गई। उसने आइमा की तरफ़ देखा और कहा— “पता है... तुम बहुत ज़िद्दी और ज़िंदादिल लड़की हो…… और ये मुझे सबसे ज्यादा पसंद
आया।”। तुमने ठीक ही कही थी, ऊर्जा अपने अनुरूप दूसरी ऊर्जा को आकर्षित करती है।
लेटर लिखने के बाद आज़ाद ने खुद को पहली बार इतना हल्का महसूस किया, जैसे सूरज की पहली किरण
पड़ते ही कोहरा धीरे-धीरे छँट गया हो और आसमान फिर से साफ़ हो गया हो। सूरज निकलने
का समय हो चुका था, लेकिन उसकी पहली किरण
अभी क्षितिज पर दिखाई नहीं दी थी। अब दोनों को वहाँ से निकलना था। पास ही लगे एक
डाक-पेटी के सामने आज़ाद पत्र को आख़िरी बार देखा, फिर बिना किसी हिचक के उसे डाक-पेटी में डाल दिया। आइमा
उसे देखती रही। फिर मुस्कुराकर बोली, “ये हुई न असली आज़ाद भारती वाली बात।” आज़ाद भी हल्का-सा मुस्कुरा दिया। आइमा ने अपना फ़ोन निकाला और एक कैब बुक कर
दी। रास्ते भर दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। कहने को अब कुछ बचा ही नहीं था
या शायद... आज की रात में वे अपने हिस्से के सारे शब्द पहले ही कह चुके थे। कुछ देर बाद दोनों अपने अपने फ्लैट पर लौट आए।
दरवाज़ा बंद करते ही आज़ाद अपनी डायरी निकाली। उस डायरी में वह हर किसी के
बारे में नहीं लिखता था। वह केवल उन्हीं लोगों को अपनी डायरी में जगह देता था, जो उसके जीवन में कोई बदलाव लेकर आते थे—कोई ऐसा
बदलाव, जो उसके भीतर बहुत देर
तक बना रहे। उसने एक नया पन्ना
खोला। ऊपर लिखा— "आइमा"। कुछ देर तक वह उस नाम को देखता रहा, जैसे मानो उसकी आवाज अभी तक उसके कानो में सुनाई दे
रही थी। वो कुछ देर तक सुनता रहा। सुनते सुनते कलम को उँगलियों के बीच घुमाया एक
छोटा-सा दिल बना दिया। और उस दिल को एक envelope से ढक दिया। बाहर दिल्ली की सुबह धीरे-धीरे उतर रही थी, और शायद आज़ाद की ज़िंदगी में भी।
2.5
आज़ाद को पंजाब जाना था। इस बार जाने से पहले उसने आइमा को फ़ोन किया, “मैं पाँच दिनों के लिए पंजाब जा
रहा हूँ। कुछ documentation
तैयार करने हैं। काम
पूरा करके लौट आऊँगा।”
आइमा ने बस इतना कहा, “ठीक है।”
फ़ोन रखने के बाद आज़ाद कुछ देर सोचता रहा। यह उसके लिए एक छोटी-सी बात नहीं
थी, शायद पहली बार उसने ऐसा किया था।
वह कहीं जाने से पहले अपने किसी करीबी को बताकर जा रहा था। उसे यह थोड़ा अजीब लगा।
लेकिन उसी अजीब-सी अनुभूति के भीतर एक अनकहा सुकून भी था। जैसे कहीं दूर कोई उसका
इंतज़ार करेगा। पाँच दिन बाद आज़ाद देर रात तक दिल्ली वापस लौट आया। उसका काम पूरा
हो चुका था। पंजाब में उसने सरकार से जुड़ा अपना बचा हुआ काम पूरा किया था— Drugs connectivity & its supply chain और साथ में खुद के लिए
आसपास के उभरते हुए रिलेशनशिप के बारे में समझने की कोशिश करता रहा, जो आइमा ने बेसिक क्लीयर किए थे।
सुबह होते ही आज़ाद ने आइमा को फ़ोन करने के लिए अपना मोबाइल उठाया। स्क्रीन
पर उसकी नज़र पड़ी तो आइमा की दो मिस्ड कॉल थीं। एक रात की, और दूसरी सुबह की। आज़ाद के चेहरे पर सुकूनी मुस्कान
उतर आई। उसने तुरंत आइमा को फ़ोन लगाने ही वाला था कि डोरवेल बज गई। वो मोबाइल वही
टेबल पर रखा और दरवाजा खोला। सामने आइमा खड़ी थी। आज वो वेस्टर्न ड्रेस में थी। उसके हाथ में फूलों का एक
खूबसूरत गुलदस्ता था, जिसकी महक दरवाज़ा
खुलते ही फ्लैट में फैल गई। आइमा ने गुलदस्ता उसकी तरफ़ बढ़ाया, “ये तुम्हारे लिए।”
आज़ाद ने गुलदस्ता लिया।
“कैसा रहा प्रोजेक्ट
कम्प्लीशन?”
“बिल्कुल तुम्हारी
तरह... हँसते-खेलते हो गया।”
"और तुम कैसी हो, और इंटर्नशिप कैसी चल रही है?"
"मैने आज छुट्टी ले ली
है।"
कुछ देर बाद आज़ाद ने पूछा, “ तो फिर आज बिरयानी बनाओगी?”
आइमा ने तुरंत आँखें छोटी करते हुए उसे देखा। “क्यों? कोई और भी आ रहा है क्या?”
आज़ाद ने शरारत भाव से कहा, “तुम्हें क्या लगता है?”
आइमा ने बनावटी गुस्से से कहा, “एक तो पाँच दिन का इंतज़ार... ऊपर से मेरी कॉल का जवाब नहीं दिया... और अब
किसी और को बुलाने की सोच रहे हो? कोई आया न... उसका क़त्ल कर दूँगी।”
आज़ाद ज़ोर से हँस पड़ा, “आतंकवाद।”
आइमा ने तुरंत कहा, “हाँ, यहीं से documentation शुरू करना—दिल्ली के आतंकवाद पर।”
दोनों खुलकर हँस पड़े। हँसी थमने के बाद कुछ पल के लिए दोनों एक-दूसरे को
निहारते रहे। आइमा की आंखे आजाद को अपने पास बुलाई। दोनों की आंखों की दूरियां जब
फिजिक्स लॉ के अनुसार 25cm से कम हो गई तो दिखना बंद हो गया, शायद इसलिए जब लोग नजदीक आते हैं तो आँखे बंद हो जाती है। आइमा धीरे से अपनी
उंगलियों को उसके उंगलियों से मिलाया। ऐसा पहली बार नहीं था कि वो दोनों की
उंगलियां एक दूसरे से अंजान थे, बस वो उतना ही एक दूसरे से मिले थे जितना रास्ते में दो इंसान चलते चलते एक
दूसरे को देखकर मिलते हो। लेकिन इस बार दोनों की उंगलियां ने पहली बार जान-पहचान
किया। फिर दोनों के उंगलियों ने आपस में दोस्ती करी और एक दूसरे से गले मिले। अब
दोनों की धड़कन इतनी पास आ चुकी थी कि धड़कन आपस में बात कर सकते थे। आंखे तो बंद
थी, इसलिए आइमा की धड़कन बोला - क्या
लाए हो मेरे लिए?
पहली बार आजाद को पता लगा था कि कोई उसके इंतजार में रहेगा, तो उसे इतनी सामाजिक ज्ञान तो आ चुकी थी कि इंतजार
करने वाले के लिए कुछ गिफ्ट ऑफर करनी होती है। आजाद उसे कुर्सी पर बैठाता है, और खुद जमीन पर बैठकर उसके पैर में कुछ बांधता है।
अभी तक उसकी आंखे बंद ही थी। आइमा को पैरों में सुरसुरती हुए चीज जैसी कुछ लग रही
थी और उससे थोड़ी थोड़ी म्यूजिक का टोन की आवाज आ रही थी। आजाद की धड़कन बोला -
पायल। आइमा ने आंखे खुली - उसने पायल पहली बार अपनी पैरों में देख रही थी। उसे उस
पायल से निकलती घुंघरू की आवाज पसंद आई। वो थोड़ी उछली, फिर ज्यादा उछली। उछलते-उछलते उसने आजाद को गले लग
गई। आजाद धीरे धीरे बहुत खुश हो रहा था। उसके मन में कई आवाजें बाहर आना चाह रही
थी लेकिन आइमा की आवाज और इस पायल की घुंघरू की आवाज को सुनकर अपनी आवाज को डकार
गया।
दोनों किचेन गए और मिलकर बिरयानी बनाने लगे। किचेन से कुकर की सिटी, घुंघरू की आवाज, टैप से निकलता पानी, कुछ बर्तनों की लड़ाई, कुछ हापुड़-हापुड़ खाने की, दोनों की हंसी और कभी कभी आइमा की दांत जोर से आजाद
के शरीर पर दबाने जाने से आजाद की करहाते निकलती आवाज हॉल में रखे सभी फर्नीचर, बल्ब्स, टंगी पेंटिंग, बोतल और दरवाजे के पास
रखी स्लीपर्स और जूते सुन रहे थे।
अच्छी वक्त न जाने इतने जल्दी क्यों गुज़र जाती है। वैज्ञानिक को इसपे रिसर्च
करनी ही चाहिए, कोई ऐसा अविष्कार करना
चाहिए कि ऐसे वक्त को धीरे-धीरे बहने दे। आज तो सूर्य भी अपनी महबूबा से मिलने के
लिए जल्दी से अपना काम करके उबर से घर चला गया था। बादल भी बरसे, जैसे अपनी-अपनी नाराज़गी कहकर घर लौट गए थे। लेकिन
चांद अध्यापक की तरह अपने स्कूल खोल दी थी और सभी तारे मानो चाहे-अनचाहे अपनी
बस्ता लिए टिम-टिमाने आ गए थे। दोनों ने मिलकर टेबल और कुर्सियां बालकनी में लगा
लिए। आज रात सुहानी और यादगार होने वाली थी। बिरयानी टेबल पर आ चुकी थी। twinkling lights फर्श पर बिछ चुके थे। दोनों ने
बिरयानी खाना शुरू किए। आज बिरयानी थोड़ी अच्छी नहीं बनी थी। लेकिन उन्हें कुछ पता
ही नहीं चला। मौसम में प्रेम की बूँदें टपक रही थीं। दोनों खाकर, फिर बालकनी में आ गए। आइमा ने शराब मांगा, आजाद फ्रीज से वही पुरानी वाली लेकर आ गया। दोनों
कुर्सियों पर बैठकर एक दूसरे से हंसी-मजाक कर ही रहे थे कि डोरवेल बजी। इस वक्त
कौन आया होगा, आजाद सोचा।
आइमा बोली, "तुम मेरे लिए शराब
ग्लास में निकालो, मै दरवाजा खोलती
हूं।" आज आजाद
"नहीं" शब्द बोलना भूल चुका था। उसने शराब को एक ग्लास में निकाला और
कुछ ice cube डाल दिया। आइमा वापस
बालकनी में आई और बोली, “गृह मंत्रालय से पत्र आया है।” उसने पत्र खोला और पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते उसके चेहरे पर मुस्कान बढ़ती गई...
फिर धीरे-धीरे वह मुस्कान उतरती गई। आज़ाद ने उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा, “क्या लिखा है पत्र में?”
“पत्र में तो अच्छी खबर
है,” आइमा बोली, “लेकिन ये सुनकर शायद इस कमरे में फिर खामोशी छा
जाएगी।” आज़ाद हल्का-सा
मुस्कुराया,
“तुमने सही कहा था... इस कमरे में ही कुछ दोष है। रहने दो, मत बताओ। बाद में मैं पढ़ लूँगा। और इसके बाद हम इस
फ्लैट में मिलेंगे भी नहीं। कहीं और मिलेंगे।”
“अब इसकी ज़रूरत नहीं
पड़ेगी।” आइमा ने अपना ग्लास उठाया और एक ही बार में खाली कर दिया। फिर कुछ उदास
होकर बोली “माननीय गृह मंत्री जी ने तुम्हें आशीर्वाद दिया है... और एक नए
प्रोजेक्ट के लिए तुम्हें बुलाया है। मणिपुर हिंसा और नॉर्थ-ईस्ट इंडिया के कुछ
समाजों पर शोध करना है।”
आज़ाद कुछ देर सोच कर पूछा, “और तुम्हारी इंटर्नशिप कब तक चलेगी?”
“परसों आख़िरी दिन
होगा।”
इसके बाद दोनों चुप हो गए। कमरे में फिर वही खामोशी उतर आई थी। बस आइमा की
बार-बार आती हिचकियों की आवाज़ उस खामोशी को तोड़ रही थी। शराब धीरे-धीरे अपना असर
दिखा रही थी। उसकी आँखें छोटी होती जा रही थीं। दोनों के चेहरों पर जैसे एक अनजाना
डर उतर आया था। आइमा लड़खड़ाती आवाज़ में बोली, “हम दोनों को डर लग रहा है... लेकिन दोनों का डर अलग
है।” आज़ाद ने उसकी तरफ़ देखा। “सही बात
है, मुझे भी डर लग रहा है। लेकिन मैं
अभी सोच रहा हूँ कि... दोनों का डर अलग क्यों है?” उसने माहौल को हल्का करने की कोशिश की, —“क्यों न हम दोनों एक-दूसरे
के डर का अंदाज़ा लगाएँ?” आइमा ने उदास होकर सिर हिला दिया। फिर कुछ सोचकर बोली, “नहीं... बोलकर नहीं। दोनों एक कागज़ पर लिखेंगे।”
आज़ाद ने कागज़ उठाया और लिख दिया—“तुम्हें यही डर है न कि मुझे वहाँ कुछ हो न
जाए?” आइमा ने भी अपना कागज़
उसकी तरफ़ बढ़ाया। उस पर लिखा था—“तुम्हें ये डर है न कि मैं फिर अकेले खुद को
कैसे संभालूँगी?” दोनों के अनुमान
बिल्कुल शब्द-दर-शब्द सही निकले। एक पल के लिए दोनों ने एक-दूसरे को देखा, फिर अपने-अपने कागज़ को नकार दिए। दोनों को ये अहसास
हो गया था कि अब वो बिछड़ने वाले है। आसमान के स्कूल में छुट्टी हो चुकी थी, सभी तारे और चांद घर चले गए थे। लेकिन बादल शायद अपनी
जीवनसाथी से रूठकर लौट आया था और गुस्से में बिजलियाँ कड़का रहा था। उसकी आवाज में
मिठास नहीं थी। हॉल में रखे सभी फर्नीचर, बल्ब्स, टंगी पेंटिंग, बोतल और दरवाजे के पास रखी स्लीपर्स और जूते शांत
होकर दोनों की आगे होने वाली बातें सुनने के लिए आतुर हो रहे थे।
आजाद बोला - फिजूल की बाते कल करेंगे, अरे कोई गाना सुनाओ ना।
आइमा बहुत देर तक सोचने के बाद गुनगुनाई -
“तू
इजाज़त दे अगर,
तुझसे थोड़ा प्यार मैं कर लूँ, जान-ए-जाँ
बैठ मेरे सामने,
ख़ाली दिल, ख़ाली नज़र भर लूँ, जान-ए-जाँ” !!!!
कुछ देर बाद आजाद डरते हुए पूछा, “अगर मुझे तुमसे मोहब्बत नहीं हुई तो आइमा?”
आइमा तेज़ गुस्से में बोली, “तुमने ही तो अभी कहा न कि फिजूल की बातें कल करेंगे।
चलो, चुपचाप अब तुम भी एक
गाना सुनाओ।” आजाद बहुत सोचा फिर एक गाना याद आया, फिर गुनगुनाया -
“इतना
न मुझसे तू प्यार बढ़ा,
के मैं एक बादल आवारा,
कैसे किसी का सहारा बनूँ,
के मैं खुद बेघर बेचारा”
आइमा की आँखो में आँसू आ गए थे। आजाद बस इतना देख उसके माथे पर एक kiss किया। आइमा कुछ पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गई। वह
पहले भी रिलेशनशिप में रह चुकी थी और उसने अपने कई दोस्तों को kiss भी कर चुकी थी। लेकिन कोई पहली बार आइमा को kiss किया था। किसी को kiss करना और किसी से kiss पाना, दोनों में इतना अंतर है जितना अंतर की परिभाषा कर पाना असंभव हो। अब बोलने के
लिए कोई शब्द नहीं था, अगर होता भी तो दोनों
को शायद नहीं पता था। रात गहरी हो चुकी थी। अब तक सब कुकर, ग्लास, फर्नीचर, जूते चप्पलें, गालियाँ, रास्ते में लगी गाड़ियां, गड्ढों में ठहरी पानी के ऊपर भिनभिनती मच्छरों, रोड पर लगे ट्रैफिक लाइट्स, कड़कड़ाने वाले बादल, दीवार के कान भी ताकते-ताकते थककर सोने चले गए थे। यंहा तक की रात भी अब सोने
चली गई थी।
आइमा झूठी कोशिश करते हुए खिलखिलाकर बोली - "अरे वाह, होम मिनिस्टर तो तुमसे नाराज़ नहीं है। तुम्हे इतना
बड़ा प्रोजेक्ट मिल गया।" आजाद बस आइमा को निहार रहा था। कुछ देर बाद आइमा फिर बोली - "पता है
नॉर्थ ईस्ट में matriarchal सोसाइटी है, तुम्हे वहाँ Feminine energy सीखने का मौका
मिलेगा।" आजाद अब भी उसे बस
निहारता रहा। आइमा हल्के से एक थप्पड़ लगाते हुए उसके चेहरे 90° घुमा दी और जोर से गले लग गई। वो इतनी जोर से गले
लगी कि अब उनकी आत्मा गले लग रही थी। आजाद के जन्म के बाद तीसरी बार उसके आँखों
में आंशू आये थे। आजाद अपने आप को भी समझ नहीं पा रहा था कि वो इतना कैसे बदल रहा
था। आइमा की आँखों में आँसू थे। उसने अपनी आवाज़ को संभालते हुए कहा, “मुझे पता है, तुम अपने काम से कितना प्यार करते हो। इस बार कोई
बहाना मत बनाना। कल ही उनसे मिलकर मणिपुर के लिए निकल जाना। हाँ… मेरी चिंता मत
करना, मैं बहुत स्ट्रॉन्ग
हूँ। देखो न, तुम्हारे गले पर अभी तक
मेरे दाँतों के निशान हैं। मैं तुम्हें लेटर लिखती रहूँगी। बस… वहाँ जाकर किसी और
से अपना दिल मत लगा लेना।”
“कुछ
देर तक आइमा की बाँहों का अहसास करते हुए आज़ाद ने रुँधे स्वर में कहा, “तुम मुझे कॉल करना, मैं इंतज़ार करूँगा। तुम पहले की तरह ही जीना…
हँसते-खेलते हुए। और,
जब अपना क्लिनिक खोलना तो वीडियो कॉल ज़रूर
करना। और हाँ… तुम्हारे दाँत थोड़े नुकीले हैं, किसी को थोड़ा धीरे से काटना।”
आइमा ने शरमाते हुए आज़ाद की पीठ पर एक मुक्का जड़ दिया। किसी ने सही ही कहा
है किसी को खुश करना हो तो उसके लिए खाना बनाओ। आखिर इंसानों को खुशी भी तो खाकर
ही मिलती है। शायद प्यार भी कुछ ऐसा ही है... जब किसी से बहुत ज़्यादा प्यार हो
जाता है, तो उसे सिर्फ़ प्यार
करने का मन नहीं करता, उसे थोड़ा-सा छेड़ने, सताने और कभी-कभी प्यार से काट लेने का भी मन करता
है। शायद ये भी प्यार जताने का एक तरीका है…
रात बीत गई। ये सारी बाते किसी ने नहीं सुना। जिनके कान थे भी और जिनके कान
नहीं भी थे।
---
मोबाइल की रिंगटोन बजी। आइमा ने फोन उठाया। “तुम तैयार हो? मैं अब निकलूँ?” आज़ाद ने पूछा।
“हाँ, निकल जाओ।”
कुछ देर बाद आज़ाद कैब से आइमा के फ्लैट पर पहुँचा। उसने अपना सामान गाड़ी में
रखवाया।
आइमा ने पूछा, “तुम्हारा सामान कहाँ है?”
“मेरा तो बस दो ही बैग
हैं, वो पीछे रख दिए हैं।”
दोनों कार में बैठ गए। आइमा ने ड्राइवर से पूछा, “भैया, एयरपोर्ट पहुँचने में कितना वक्त लगेगा?”
ड्राइवर बोला, “मैडम, लगभग एक घंटे में पहुँच जाएँगे।”
“ठीक है भैया… थोड़ा
धीरे ही चलना।”
दोनों अपने अपने खिड़कियों से बाहर देख रहे थे। बस दोनों की उंगलियां आपस में
गले मिल रहे थे, हँस रहे थे, रो रहे थे, खेल रहे थे, उछल रहे थे, एक दूसरे को नाखूनों से काट रहे थे, जब थक गए तो एक दूसरे के साथ सो गए। गाड़ी एयरपोर्ट
पर ठीक 8 बजे पहुंच चुकी थी।
सूर्य भी अपना प्रकाश से चमक रहा था। दोनों बोर्डिंग पास लेकर वेटिंग हॉल में बैठ
गए। आज आजाद मणिपुर के लिए निकल रहा था और आइमा बंगलौर के लिए। आइमा की फ्लाइट
सुबह 11 बजे थी और आज़ाद की रात 10 बजे। आज़ाद को अभी बहुत देर बाद जाना था, मगर आइमा के साथ उसके पास सिर्फ़ सुबह तक का वक्त था।
अब दोनों की उँगलियों की नींद पूरी हो चुकी थी। शायद दोनों उँगलियों को अब आभास हो
गया था कि बिछड़ने का वक्त करीब है। अब उनकी उँगलियाँ खेल नहीं रही थीं, बस एक-दूसरे को महसूस कर रही थीं।
आइमा की फ्लाइट का एनाउंसमेंट हुआ। दोनों की आँखें आज दूसरी बार एक-दूसरे से
मिली। दोनों को बोलने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन कोई शब्द मुंह में आ ही नहीं पा रहा था, शायद वो शब्द अभी सो रहे थे। दोनों ने सिर्फ इतना
बोला- “अपना
ख्याल रखना।” आइमा
उठी और अपनी छोटी-सी खादी की पोटली आज़ाद के हाथों में रख दी। वह पोटली इतनी छोटी
थी कि उसे देखकर आज़ाद को समझ ही नहीं आया कि आखिर इसमें ऐसा क्या रखा हैं। आइमा ने बस इतना कहा, “जिस दिन तुम्हें कभी किसी से मोहब्बत होगी, तभी इस पोटली को खोलना।” इतना कहकर वह मुड़ी और फ्लाइट की ओर जाने लगी। आज़ाद
उसके हाथों में पड़ी उस छोटी-सी पोटली को देखता रह गया। उसे पहली बार लगा, कुछ चीज़ें छोटी होकर भी अपने भीतर बहुत कुछ समेटे
होती हैं।
कुछ देर बाद जब आइमा की फ्लाइट उड़ान ले चुकी थी, तब आजाद अपना डायरी खोला और एक
नए पन्ने में लिखा – “मिलना
जरूरी था” !!

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