मिलना जरूरी था (part 1)
मिलना जरूरी था Part 1 (मुलाकात) 1.1 दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते हुए न जाने कितने भौगोलिक दृश्य धीरे-धीरे बदल जाते हैं। कहीं नारियल के पेड़ों की कतारें पीछे छूट जाती हैं , तो कहीं खेतों का विस्तार आँखों के सामने फैलने लगता है। रेल अपनी सरसराहट के साथ आगे बढ़ रही थी और खिड़की के बाहर बदलते दृश्यों को आइमा अपनी आँखों में समेटती जा रही थी। सफर की लंबाई और बोरियत से बचने का इससे अच्छा उपाय उसे सूझा भी नहीं था। आइमा के पिता फिरोज के मन में अलग एक चिंता चल रही थी। उन्हें डर था कि बिहार में न जाने कैसे लोग मिलेंगे , कैसी जगह होगी और गाँव में रहना उनके लिए कितना कठिन होगा। तबादला रद्द तो हो नहीं सकता था , इसलिए नए कार्यालय में हाजिरी देना ही थी। सरकारी नौकरी में यही डर बनी रहती है—कब , कहाँ और किस जगह जाने का आदेश आ जाए , कोई नहीं जानता। इन्हीं विचारों में खोए फिरोज के कंधे को आइमा ने धीरे से हिलाया , “ कहाँ खो गए , डैडी ? टीटी सर आए हैं , टिकट तो दिखाइए।” फिरोज ने जैसे अचानक अपनी सोच से बाहर आकर टिकट निकाल लिया। टीटी ने टिकट देखा और मुस्कुराते हुए बोला , “ आप लोग बिहार जा रहे हैं ? हम भी बिहार...