मिलना जरूरी था
मिलना जरूरी था Part – 2 ( संगीतमय साथ ) 2.1 जनवरी की कड़कड़ाती दिल्ली की संध्या थी। आज़ाद राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर खड़ा वैशाली लौटने वाली मेट्रो की प्रतीक्षा कर रहा था। दिल्ली आए उसे दो सप्ताह बीत चुके थे , परंतु आज भी वह इस उलझन में रहता कि कौन-सी मेट्रो वैशाली जाती है और कौन-सी नोएडा। उसने समीप खड़े एक सज्जन से पूछा , " भाई साहब , वैशाली जाने वाली मेट्रो यहीं आएगी ?" सज्जन ने उसे ध्यान से देखा और आश्चर्य से बोले , " अरे आज़ाद बेटा , तुम यहाँ ?" आज़ाद ने गौर से देखा। सामने फिरोज अंकल खड़े थे। वह झुककर उनके चरण स्पर्श कर बैठा। वैसे तो इस्लाम में पैर छूने का कोई मतलब नहीं होता है लेकिन यह भारतीय संस्कृति है इसलिए आजाद से यह हो गया। फिरोज संकोच भाव से बोले , " बेटा , यदि तुम्हें जल्दी न हो तो कुछ देर बैठकर बातें करें ?" “ जी अंकल जरूर। ” दोनों स्टेशन के भीतर स्थित एक कैफ़े में जाकर बैठ गए। फिरोज बोले , " मैं रेलवे की ओर से ट्रेनिंग के लिए दिल्ली आया था। तुम मिले हो तो कुछ कहना था। " जी अंकल , कहिए। मैं सुन रहा हूँ।" उन्होंन...