मिलना जरूरी था

novel को डिवाइडेड part wise में रखा गया है।

Part 1

दक्षिण से उत्तर भारत आते हुए न जाने कितने प्राकृतिक भौगोलिक दृश्य बदल जाते हैं। रेल सरसराहट सुर में आगे बढ़ती जा रही है।  आइमा बोरियत से बचने के लिए खिड़कियों से बदलते दृश्य को अपने आंखों में समा रही थी। आइमा के पिता फिरोज को ये बात से डर था कि बिहार में ना जाने कैसे लोग मिलेंगे। चुकीं तबादलता कैंसिल हो नहीं सकता, कार्यालय में तो हाजिरी देनी ही होगी। सरकारी कर्मचारियों का यही डर बना रहता है कि कब, कहां और कौन ट्रांसफर हो जाए। 

ये सब बाते सोच ही रहे थे कि आइमा अपने पिता के कंधे को  हिलाते हुए बोली -  कहा खो गए आप,  टीटी  सर आए है टिकट तो दिखाए। टीटी टिकट देखते ही बोला आपलोग बिहार जा रहे है,  हम भी बिहार से ही हैं, न जाने हम कब घर जाएंगे ? पता है आपको हम कई साल से यहीं काम करते है चेन्नई से हैदराबाद और हैदराबाद से चेन्नई। उत्सुकता से फिरोज बोले आप अपने परिवार के साथ ही रहते तो घर का याद क्यों आता है ? कौन बोला हम परिवार के साथ रहते है, हम तो अकेले रहते हैं।“ हम और अकेले” | फिरोज अभी भी नहीं समझ पाए, यह देखकर आइमा दुबकी मुस्कान से ये बर्तलाप सुन रही थी। टीटी बोले _चलिए फिर कभी मिलेंगे, दुआओं में याद रखियेगा .  आपका सफ़र मंगलमय हो। फिरोज बोले तुम मुस्कुरा क्यों रही हो ? एक तो पहले से ही टेंशन में हु और ये मुझे और कन्फ्यूज कर के चला गया। आइमा बोली टीटी सर अपने बारे में सिर्फ बात बोले हैं, बिहार में “मैं” को “हम” बोलते है। लेकिन ऐसा क्यों ?  शायद जिस प्रकार हम अमन, शांति या इत्तिहाद की बात करते है वैसे ही बिहार में भी इस प्रकार से कुछ हो। तुम्हे कैसे पता चला ये बात ? मैं reels में देखी थी। फिरोज मुस्कुराते हुए बोले _  अब मैं नहीं, हम reels में देखे थे ऐसे बोलो।


सफर लंबी थी और उनके सीट के सामने वाली सीट पर यात्री बदलते जा रहे थे। फिर नए नव जोड़े पहुंचे। उनके साथ एक बच्चा भी था । छोटे बच्चे आइमा को दीदी दीदी बोल रहा था।  यह देखकर फिरोज को लगा, चलो अब आइमा का मन बहल जाएगा। शाम होने को थी और ट्रेन में कुछ खाने को नहीं था। ज्यादातर सिर्फ पानी-पानी, ठंडा-पानी बोलते हुए बेच रहे थे। फिरोज बोले अरे भाई कुछ खाने के लिए भी लाओ, भूख भी लगी है और एक ठंडा पानी भी दे देना। कितने हुए ? आइमा बोली हर जगह 20 के होते हैं डैडी । 

नव जोड़ के पुरुष बोला – नहीं-नहीं, रेलवे का जल 15 रुपये का आता है। फिर उसने अपने बैग से चूड़ा, मिक्सर और कटे हुए प्याज और मसाले निकले और मिक्स करके फिरोज को दिया। 

‘अरे नहीं नहीं वह रेलवे कर्मचारी वाले खाना लेकर आएंगे’ – फिरोज शर्माते हुए बोले। 

अरे खाइए कुटुम !! वो कब आएगा, नहीं आएगा, पता नहीं, दिखाइए यह देसी खाना है पेट ना सही लेकिन मन तो जरूर भर जाएगा । फिरोज संकोच में पूछा यह क्या है ? इसका जवाब देते हुए उसने बताया इसे बिहार में हम भूंजा बोलते हैं जैसे शहर में पास्ता चाऊमीन खाते हैं ना, वैसे ही यह गांव में शाम का नाश्ता है, और ये तो शरीर के लिए अच्छा भी होता है। बच्चों के साथ खेलती हुई आइमा ने बोला खा लो खा लो पापा अब हम भी तो बिहारी ही बनने वाले हैं। बिहार बनने वाले हैं मतलब ? मेरे पापा रेलवे विभाग में काम करता है और उनका बिहार में ट्रांसफर हुआ है। वैसे पापा बिहार में वह कौन सी जगह हम जा रहे हैं। वो गया जिले के भगवानपुर स्टेशन है। लगता है आप अखबार नहीं पढ़ते हैं क्या, अब गया जिला का नाम गया जी हो गया है धार्मिक स्थल है ना। अरे खाई कुटुम आप तो लगता है शरमा रहे हैं। बिहार में ना नहीं बोलते। वैसे कितने वक्त के लिए आ रहे हैं आप ? पता नहीं भाई जब सरकार का मन चाहा तब तक रहूंगा चाहे वह दो महीना हो या दो साल। 

तब तो आप वापस नहीं ही लौट पायेंगा। क्यों ऐसा क्यों, फिरोज ज़रा डरते हुए पूछा। आप डरे नहीं, क्या है न कुटुम जो एक महीना बिहार में रह लेगा ना, उसे बिहार अपना लेता है और दिल में बसा लेता है। 

डरने की बात नहीं है ट्रेन भगवानपुर स्टेशन रात के 2:00 बजे पहुंचेगी। और गांव के आसपास सुविधा रहेगी या ना रहेगी इस का चिंता है।

चिंता काहिल कर रहे हैं भारतीय रेल तीन चार घंटा लेट ही चलती है। सुबह-सुबह उतर जाएगा सूरज बाबा के रोशनी के साथ। 


भगवानपुर ठीक सुबह 4:00 ट्रेन पहुंची । स्टेशन पर ही कुछ कर्मचारी फिरोज से मिले और उनका स्वागत किया। आईए सर आईए, कोई दिक्कत तो नहीं हुई ना ट्रेन में। ऐसा स्वागत देखकर फिरोज को मन ही मन अच्छा लगा। सभी लोग स्टेशन क्वार्टर रूम पहुंचे । आप अभी यहां पर आराम कीजिए और कुछ जरूरत हो तो मुझे बुला लीजिएगा। हमारा नाम सुधीर है। दोनों आराम किए फिर फ्रेश होकर ऑफिस जाने के लिए तैयार हो ही रहे थे कि दरवाजे पे खट खट की आवाज आई|  चलिए सर सुबह सुबह अपना आगमन का संदेश कार्य कार्यालय में करवा ले वरना भीड़ हो जाएगी। ये लीजिए प्रसाद खाइए आज ही गांव में नए मंदिर का शिलान्यास हुआ है। फिरोज झिझकते हुए नहीं बोलना चाह रहे थे लेकिन आइमा ने आंखों से इशारा करते हुए बोली खा लो डैडी। आइमा ने बोला सुधीर अंकल  क्या मैं गांव अकेले घूम सकती हूं? आप हमारे मेहमान हो और यह गांव भी अब आपका भी है जाइए गांव की सुगंध का मजा लीजिए। गर्मी  बहुत है पानी का बोतल रख लीजिए आप, और गांव में पानी नहीं बिकती, जब खत्म हो जाए तो किसी भी घर से मांग लीजिएगा। 

फिरोज और सुधीर बस पकड़कर जिला के लिए रवाना हो गए और इधर आइमा गांव घूमने के लिए। सुबह सुबह आइमा खेतों में हल जोतते हुए किसान,  कुएं से पानी निकलते हुए महिलाएं और किताबों को सीने से लगाकर स्कूल जाते हुए बच्चे दिखे। आइमा पहली बार ये सब देख रही थी। उसने तुरंत उन सब का अपने मोबाइल में तस्वीरे कैद करना शुरू कर दी। दोपहर होते ही स्कूल के बच्चे गांव के बगीचे में दिखे, तो आइमा ने आश्चर्य से पूछा तुमलोग तो अभी स्कूल गए थे ना ? सभी बच्चे भी आश्चर्य से देखा आप कौन ? मैं तुम्हारी स्कूल की नईं टीचर हूँ। बच्चे यह सुनकर भागने लगे। आइमा ने आवाज देते हुए बोला भागो नहीं मैं मजाक कर रही थी। फिर सभी बच्चे वापस आए। हमने खिचड़ी खा ली है इसलिए स्कूल से वापस आ गए। तो तुम सब यहां क्या कर रहे हो ? अगर आप किसी को नहीं बताओगी तो फिर हमलोग बताएंगे। ठीक है नहीं बताऊंगी । अभी हमलोग कच्चे आम तोड़ेंगे और मसाले के साथ खाएंगे, और आप भी खाओ बहुत अच्छा है। जब आइमा ने चखा तो स्वादिष्ट ही लगा, इसलिए वो भी इस शरारत में शामिल हो गई। बच्चों ने आइमा को पेड़ पर भी चढ़ना सिखाया। पेड़ के ऊपर से पास ही छोटी पहाड़ी पर एक इंसान बैठा दिखा। वो कौन है उस पहाड़ी पर ? वो आजाद भैया हैं। इतनी गर्मी में वो भी पहाड़ पर और अकेले भी, पागल है क्या ? नहीं नहीं , वो इस गांव के सबसे समझदार भैया है और हमसब से काफी प्यार भी करते है। वो आज उनका जन्मदिन है ना इसलिए अकेले बैठे हैं । उनके मम्मी पापा कोई भी नहीं है ? अरे नहीं दीदी, वो अपने जन्मदिन पर किसी से नहीं मिलना चाहते है बस यही बात है। अब हमारा घर जाने का वक्त हो गया है, बाय दीदी, हम फिर कल मिलेंगे। आइमा को आजाद  दिलचस्प (Interesting) लगा इसलिए मिलने भी चली गई। 


आइमा को पहाड़ी पर चढ़ते चढ़ते साँस फुल गई। पहुँचते ही उसने बोली - बड़े निहायती बेढंग किस्म के इंसान हो आजाद तुम। मेरी बोतल की पानी भी खत्म हो गई तुमसे मिलने के लिए। यह बोलकर वो बगल में बैठ गई। उसके बैठते ही आजाद उठकर चल दिया। आइमा अपने आप को खिन्न भाव से मन में बोली कितना खड़ूस है, इसके लिए मैंने इतनी मेहनत करके ऊपर चढ़ी। आजाद वापस आकर शीतल जल ग्लास में दिया। ये पानी पी लो और चुपचाप बैठो सांस थम जाएगी और तुम्हें सुकून मिलेगा। 


आइमा कुछ देर तक चुप रही और फिर बोली अब तुम भी कुछ पूछोगे या सिर्फ मैं बोलूं ? आजाद पूछा_ क्या नाम है तुम्हारा _ आइमा मेरा नाम है।  और पूछो कहां से आई हो, कौन हो ? तुम्हे मेरा नाम कैसे पता चला ? वो गांव के बच्चे ने बताया कि एक पागल जिसका नाम आजाद पहाड़ी पर बैठा है इसलिए मिलने आई। वैसे तुम्हारा आज जन्मदिन है ?  बोलो भी _ आइमा जोर देते हुए बोली

 हां-  आजाद स्थिर भाव से जवाब दिया। 

डैडी वापस आते समय एक केक लेकर आना । आइमा अपने फोन से डैडी को बोला। 

are you mentally stabled ? आजाद ने पूछा ! 

सूर्यास्त हो रहा है, क्या तुम मेरी तस्वीर मोबाइल में कैद कर सकते हो ?  आजाद को हामी भरनी पड़ी। अच्छी नहीं है, पूरी नहीं आया बोल बोलकर 30-40 तस्वीर खिंचाई। 

Are you anti social kind of boy ? आइमा ने पूछा 

You should not have to order cake for me. आजाद बोला। 

लेकिन क्यों ? 

हम अभी बताना नहीं चाहते। 

कोई बात नहीं मुझे एक ग्लास और पानी पीना है। 

अब तो यह खत्म हो गया है, चलो गांव में मेरा घर  है वहां तुम्हारी बोतल भी भर जाएगी और पानी भी पी लेना। 


ये तुम्हारा घर है, काफी सुंदर है। लेकिन घर में कोई क्यों नहीं है। मां शायद बकरियां लाने गई होगी आजाद बोल ही रहा था कि आइमा ने फिर पूछा तुम्हारे पापा पक्का दवाई से संबंधित काम करते होंगे.... इतनी सारी दवाइयां। मेरे पापा बंगलौर में काम करते थे । उन्हें बिहारी होने के कारण वहां के लोगों ने उन्हें पीटा, हाथ तोड़ दिया और सिर में भी कई चोट दिए। मैं भी बंगलौर से ही हूं आइमा ने बीच में टोकते हुए बोली। आजाद पानी भरते भरते रुक गया। एक समय के लिए दोनों एक दूसरे को एक टक देखते रहे। इतने में आजाद की मां आ जाती है। फिर आइमा उसकी मां से काफी बात करती है। शाम ढलते ही मां आजाद को उसे उसके स्टेशन रूम तक छोड़ने को बोलती है। दोनों निकलते है _ दस मिनट तक दोनों चुपचाप रहते हैं फिर आइमा बोलती है मुझे लग रहा है कि तुम कुछ बोलना चाह रहे हो। आजाद बोलता है मुझे भी लग रहा है कि तुम कुछ बोलना चाह रही हो । और अगर दोनों का जवाब हां है तो लेडिस फर्स्ट। मैं फेमिनिस्ट हूं इसलिए पहले तुम बोलो। ये सुनकर दोनों मुस्कुरा देते हैं।


आजाद बोला तुम्हें डर नहीं लगा मैं तुम्हें चोटिल भी कर सकता था ये बताते हुए कि तुम बैंगलोर से हो। ये जानते हुए मेरे पापा की ये हालत बैंगलोर वाले कि वज़ह से हुई ? 

नहीं, पहली बात तुम मुझे काफी शांत और सुचारू ढंग के लगे । दूसरी बात तुम पढ़े लिखे भी हो। 

और तुम क्या पूछना चाह रही थी ?   मैने सुना था कि बिहार में सभी के पास कट्टे बंदूक जैसे हथियार होते है और बदला भी लेते है। ह्म्म प्लान तो यही था, तभी तुम्हारे पिता का तबादला का समाचार मिलता है कि कोई बंगलौर से ही हमारे गांव में आ रहा है। और पूरे गांव की सर्वसम्मति से यह फैसला हुआ कि हम गांव वालो तुम्हारे पिता को इतना प्रेम दे जिससे जो  द्वेष, ईर्ष्या फैली है वो दूर हो जाए।


वैसे हम gen Z में ये खासियत तो आई है कि हम धर्म जाति लिंग वंश क्षेत्र आदि  के नाम पर बैर नहीं करते। 


दोनों स्टेशन पहुंचे वहां फिरोज और सुधीर, आइमा का इंतजार कर रहे थे। 

यह केक क्यों मंगवाए ?  फिरोज ने पूछा

इनसे मिलिए इनका नाम आजाद है और आज आजाद का जन्मदिन है। सुधीर तुरंत बोला लेकिन आजाद तो जन्मदिन नहीं मनाता। नही मनाता होगा लेकिन आज मनाएगा। सुधीर को ये बात बहुत विचित्र लगी। फिरोज आज गया जी जिले से वहां के प्रसिद्ध मिठाई अनरसा लेकर आए। फिर सभी ने जन्मदिन मनाया। सुधीर और फिरोज थके हुए थे इसलिए सोने चले गए। 

आइमा अभी भी आजाद से कुछ बात करना चाह रही थी। दोनों भगवानपुर स्टेशन के बाहर लगे बेंच पर बैठ गए।  रात हो चुकी थी आसमान में तारे बिखरे पड़े थे । आइमा कुछ वोलेने ही वाली थी इस पर टोकते हुए आजाद ने बोला क्या हम 10 मिनट शांत बैठ सकते हैं। आजाद आसमान में टिमटिमाते हुए तारे को देख रहा था और आइमा उसे टिमटिमाते हुए तारे का प्रतिबिंब  (reflection) आजाद के आंखों में देख रही थी। आइमा से रहा नहीं गया कुछ देर के बाद बोली - क्या देख रहे हो आसमान में ? तुम तो रोज इसे देखते होगे। तुम्हे तारे पसंद है? 

मैं तारे के अंदर की दुनिया को देख रहा हूं आजाद के मुंह से अपने आप निकल गया। आइमा ने  ये सुनकर चुप हो गयी और आसमान के अंदर के दुनिया को खोजने लगी। आजाद बोला अब मुझे घर के लिए निकलना चाहिए। जाने से पहले मैं तुमसे सॉरी बोलना चाहता हु, न जाने कितनी बार मैने बेरुखी अंदाज से बात किया। आइमा अभी भी शांत थी, उसने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ बोलो भी , कहा खो गई_ आजाद ने आइमा के सिर पर तफ़ली मरते हुए बोला। 


शायद आइमा सॉरी बोलना सुनी नहीं, और आजाद फिर से बोलना चाहा पर बोला नहीं। मैं घर के लिए निकल रहा हु। देखो मैं इकोनॉमिस्ट हु तो मैने पार्टी दी तो तुम्हे भी गिफ्ट देना चाहिए ना। 

मैडम जिसका बर्थडे होता है उसे गिफ्ट मिलता है और तुम तो सामने से मांग रही हो । 

हां,  ये तो नॉर्मल लोगो के लिए रूल है न, तुम जैसे फिलोस्फर्स के लिए उल्टा रूल चलता है। 

बोलो क्या चाहिए मैडम को इतनी रात में गिफ्ट ? 

तुम मुझे कही कल घुमाने चलोगे। और मैडम को कहा घूमना है ? देखो घूमने के लिए तो गया और बोधगया बहुत अच्छा जगह है, पर्यटक स्थल है, लेकिन तुम मुझे वहां ले चलो जो अलग हो और बहुत कम भीड़ हो। अच्छा सोचता हु। कल मै  यही तुम्हारा सुबह इंतजार करुंगी। दोनों शुभ रात्रि बोलकर अपने अपने रूम चले गए। 


यह पर एक पात्र के बारे में बताना जरूरी हो जाता है कि आइमा आजाद से 2 साल बड़ी थी। और वो बंगलौर में साइकोलॉजी की स्टूडेंट थी। यहां पर आइमा का आजाद के लिए आकृषित होने का कई कारण हो सकता है जैसे वो शहरी लड़की है तो उसका रुझान होना आम बात है। यह भी जो सकता है कि आजाद को समझने के लिए साइकोलॉजी में एक कैसे स्टडी की तरह ले रही हो। और यह भी हो सकता है कि आजाद के इस अनोखे व्यक्तित्व उससे आकर्षित किया हो। मुझे भी पता नहीं।  ये मै आप सभी पाठकों पर छोड़ता हूं। 


कल सुबह 8 बजे आजाद बाइक लेकर स्टेशन आया। आइमा अपने पिता से जाने की बात की। फिरोज को शायद ये अच्छा नहीं लगा कि उसकी बेटी किसी के साथ इतनी नजदीक आ जाए। उसके मन में अभी भी कई कारण थे जिससे वो उभरे नहीं थे जैसे धर्म जाति लिंग वंश क्षेत्र आदि। लेकिन साथ में यह भी नहीं चाहते थे कि बेटी के मन में ये विचार आए। क्योंकि वो भी जानते थे कि इस सभी भेदभाव का निवारण आपसी लगाव और प्रेम ही है। 


दोनों बाइक पर बैठे और निकल गए। हम आज कहां जा रहे हैं ? तुम्हें मुझ पर भरोसा है ? शायद हां और शायद नहीं भी। दोनों धुन में जा ही रहे होते हैं तभी बीच में एक बकरी आ जाती है। आजाद जोर के ब्रेक लेता है। आइमा का हाथ आजाद के कमर को जोड़ से पकड़ लेती है। ये तुम्हारे कमर पर क्या है? कट्टा है क्या ? तुम कट्टे लेकर क्यों आए? 

तुम अगर ज्यादा बोली तो यही ढेर कर दूंगा। ये बोलकर बाइक आगे बढ़ती है। कुछ और दूर जाने के बाद आजाद बाइक एक बेजान सड़क पर रोक दिया। आ गए जहां आपको घूमना है। आइमा चारों तरफ देखी । चारों तरफ न कोई इंसान न ही कोई पर्यटक स्थल दिखा । पास में सिर्फ एक पहाड़ी दिखी और एक आदमी का प्रतिमा जिसे एक घर के आकर के अंदर रखा था। आइमा को काफी गुस्सा आ रहा था मन ही मन बोली इससे कितना लगाव है पहाड़ी से । कम से कम मुझे समझकर कुछ अच्छे जगह लेकर आता। 


अपने चेहरे से ये जो गुस्सा है वो उतारो पहले और ईख का ज्यूस पियो। तुम्हारी गला सुख गई होगी ।आजाद अपने बैग से दो मिट्टी के ज्यूस से भरी बोतल निकला। आइमा शांत होकर ज्यूस पिया। कुछ बताने से पहले इस पहाड़ी पर चलते हैं जिस पर पक्की सड़क बनी हुई थी। दोनों टहलकर वापस आ गए और उसी प्रतिमा के नीचे बैठ गए। आइमा से अब रहा नहीं गया इसलिए पूछा इसमें मुझे क्या देखना था ? यह प्रतिमा दशरथ मांझी का है वह इसी गांव से थे...... और पूरी कहानी सुनाई।

पाठकों के लिए बस इतना जाना चाहिए कि इस दशरथ आदमी की गर्भवती पत्नी  इस पहाड़ी को पार  करते वक्त गिर जाती है और मर जाती है। और किसी के साथ ऐसा न हो इसलिए वो अकेले अपने बलबूते पर छेनी हथौड़ी से पूरा पहाड़ी काट देता है जिसमें पूरे  20 साल लग जाते है और ये कटी पहाड़ी तोहफ़ा के रूप में अपनी मरी हुई पत्नी को देता है। 


आइमा पूरी कहानी सुनकर काफी भावुक हो जाती है। आजाद उसकी आंखों को गैर से देखता है। आंखे आंसुओं से भरी पड़ी थी। वो इन आंसू  को पोछना चाहा , पर जैसे ही आइमा की आँखें बंद हुई आंसू जमीन पर गिरने से पहले ही गर्मी की चिलचिलाती ऊष्मा से भाप बन गई। आजाद वक्त का नजाकत को देखते हुए बोला  - लगता है आज कट्टा का उपयोग नहीं हों पाएगा। इस पर आइमा आइमा आंसू पोछते हुई हंसी। आजाद इस कार्य में सफल हो गया था।  वैसे मुझे भी दिखाओ कट्टे कैसे होते है ? तुम्हे सच में ऐसा लगा कि मैं कट्टे लेकर आया हु। मैने सिर्फ मजाक में बोला था।

आइमा आजाद से जन्मदिन ना मनाने का कारण पूछे। 

आजाद बताया - मैं बचपन से पूरी दुनिया घूमना चाहता था । लेकिन क्यों इसका कारण मुझे मिल नहीं पा रहा था। इसका जवाब तभी मिल सकता था जब मैं घूमने शुरू करता। घूमते घूमते मैं बोधगया पहुंचा जहां गौतम बुद्ध के बारे में जाना जहां उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। मैंने पाया मेरा घूमना एक टूरिस्ट की तरह न होकर एक ट्रैवलर की तरह  है , जिसमें मैं देश के सभी समाजों में जाकर उन बारीकियों को जानू और पढू।  लेकिन जब मैं यह कर रहा हूं तब मुझे एक समस्या आ रही थी जो की पक्षपात (biased opinion) या पूर्वाग्रह करना होता है । और इसका समाधान यही है कि पहले मैं खुद को जानू। और इसका सिर्फ एक ही माध्यम है अपने साथ समय बिताओ। जो कि प्रत्येक मनुष्य के लिए ये करना काफी मुश्किल है। इसलिए जन्मदिन पर मै सिर्फ "मैं" होता हु वहां "हम" नहीं आते चाहे वो कोई मनुष्य हो या विचार। बस इतनी सी बात थी। इतना बोलकर आजाद धीमे-धीमे मुस्कुराता है। 

आइमा ये सुनकर भौचक्क रह गई । 

वैसे तुम भी कुछ अपने बारे में बताओ ?

 मैं साइकोलॉजी की स्टूडेंट हूं और मैं संगीत में एक प्रसिद्ध गायिका बनाना चाहती हु। आइमा के मुंह से अपने आप निकला गया क्योंकि अभी तक आइमा की आँखें आजाद के चेहरे को जोर से पकड़ रखी थी। आजाद मुस्कुराते हुए गाते हुए बोला _ ऐसे मुझे न देखो  सीने से लगा लूंगा और आपको मुझसे मोहब्बत हो जाएगी। 

तो लगा लो गले !! 

 दोनों के चेहरे खिल उठी। 


प्यार के उस पवन धरती जहां प्यार के लिए पूरी पहाड़ी काट दी गई शायद ये दोनों अपने प्यार का बीज बो दिए। 


इस तरीके से दोनों रोज मिलते, घूमने निकलते, एक दूसरे के बारे में जानते, प्यार की कुछ बाते करते और लौट आते। समय बीतता गया और पूरे 17 दिन बीत गए। आज शाम में आइमा ने आजाद को बताया कि वो कल बंगलौर के लिए निकल रही है। आजाद को पता था कि एके दिन तो ऐसा होगा ही।

आइमा ने रोज की तरह उसे कल सुबह स्टेशन पे बुलाया और बोली 8 बजे आना 8:30 में ट्रेन है। आजाद जवाब नहीं दिया। वो शांत तो गया था। रात में घर की छत पर खटिया बिछाए सोने की कोशिश कर रहा था। पर नींद नहीं आ रही थी, बहुत बेचैनी हो रही थी। शायद आजाद नहीं चाह रहा था कि आइमा वापस जाए। उसने पूरी रात आसमान के सभी तारों से बात किया। 

कल सुबह 8 बजे आजाद स्टेशन पे आया। उसकी आंखे पूरी लाल थी। आंखे की पलकें बार बार  आंख को चादर पहनने की कोशिश कर रही थी। दोनों मिले। बैग तैयार थे और ट्रेन भी आ चुकी थी। आजाद उसे पहली बार गले लगाना चाहता था पर उससे ये करना नागवार लगा। अभी तक आइमा को ऐसा कुछ महसूस नहीं हो रहा था। फिरोज, सुधीर और आजाद तीनों आइमा को ट्रेन पर बैठकर, खिड़कियों से बाय कर रहे थे। इतने में आइमा बाहर आकर आजाद को जोर से गले लगाकर बोली थैंक्स आजाद एक सुनहरा यादगार पल और एक अच्छा दोस्त बनने के लिए। आजाद पूरा स्थिर हो चुका था, वो चाहकर भी हिल नहीं पा रहा था। ट्रेन चलना शुरू हुई और जैसे जैसे स्पीड बढ़ीं वैसे वैसे आजाद की धड़कन। कुछ देर में ट्रेन ओझल हो गई। आजाद वहीं खड़ा रह गया।  स्टेशन पर एक चाय की दुकान के रेडियो पर गाना बज रहा था_ एक अजनबी हसीना से यूँ मुलाक़ात हो गई "फिर क्या हुआ?" ये ना पूछो, कुछ ऐसी बात हो गई !!!!!!


हर कहानी में किरदार को मजबूत बनाया जाता है । सामाजिक तौर पे देखा जाए तो खास कर पुरुष को हर हाल में मजबूत बनना पड़ता है। अच्छी बात ये है कि अब ये दौर बदल  रहा है, अब ये genZ  की दुनिया बन  रही है जहां पुरुष को कमजोर होने एक अच्छे इंसान की पहचान बन जाती है। और इसके लिए हम सभी पुरुष समाज को इस genZ  और इसमें पली बढ़ी स्त्रियों का शुक्रगुजार होना चाहिए। 


खैर, कहानी की और बढ़ते हुए ये देख गया गया कि आइमा के जाते ही आजाद बीमार पड़ जाता है। और उधर आइमा भी। जब प्रेम का दर्द मन ही मन न होकर शरीर पर असर कर जाए तो यही होता है। अब आइमा को भी आजाद की आदत हो चुकी थी। हर दिन सुबह 8 बजे तैयार होती लेकिन उसे लेने के लिए कोई आजाद नहीं आता। इधर रोज आजाद 8 बजे स्टेशन तो आता है और उसी ट्रेन को जाते हुए देखता है। फिरोज को जब पता चला कि वहां आइमा की तबियत बिगड़ गई है और इधर आजाद का भी तो उसे अनुभव हो गया था कि शायद इस प्रेम के बीज को पानी की जरूरत है। ऐसा अनुभव फिरोज को इसलिए आया कि वो भी अपने यौवन में इस दर्द का भोगी था। फिरोज दोनों को सलाह देता कि फोन से एक दूसरे से बात करे। लेकिन न ही आजाद आइमा को फोन करता है और न ही आइमा आजाद को फोन करती है।


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 PART 2 coming soon


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